Europe Protests : सुनहरे भविष्य के बड़े-बड़े सपने लेकर यूरोप का रुख करने वाले अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों के लिए अब स्थितियां वैसी बिल्कुल नहीं रहीं, जैसी पहले हुआ करती थीं। वर्तमान समय में ब्रिटेन, आयरलैंड, जर्मनी और नीदरलैंड जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों में प्रवासियों को लेकर चल रही राजनीतिक और सामाजिक बहस ने काफी हिंसक रूप अख्तियार कर लिया है। सड़कों पर उतरते स्थानीय लोग और वहां की सरकारों द्वारा वीजा नियमों में लगातार की जा रही सख्ती ने उन लाखों भारतीय युवाओं की चिंता को काफी बढ़ा दिया है, जो अपने दिल में ‘यूरोपियन ड्रीम’ को संजोए हुए हैं और वहां जाकर करियर बनाना चाहते हैं।

आखिर क्यों भड़का यूरोपीय देशों में स्थानीय लोगों का गुस्सा?
यूरोप के कई विकसित देशों में स्थानीय नागरिकों की इस भारी नाराजगी और गुस्से के पीछे कई गहरे सामाजिक व आर्थिक कारण छिपे हैं। आर्थिक जानकारों के अनुसार, इसका सबसे मुख्य और बड़ा कारण शहरों में मकानों की भारी कमी और उनकी आसमान छूती कीमतें हैं। इसके साथ ही, वैश्विक मंदी और बढ़ती महंगाई ने स्थानीय संसाधनों पर दबाव को दोगुना कर दिया है। वहां के मूल निवासियों को अब यह लगने लगा है कि प्रवासियों के लगातार आने से उनके अपने बच्चों के लिए रोजगार और विकास के अवसर बेहद कम हो रहे हैं।

पब्लिक सर्विसेज पर बढ़ता दबाव और सुरक्षा संबंधी चिंताएं
साल 2015 के ऐतिहासिक शरणार्थी संकट के बाद से ही यूरोप के स्कूलों, अस्पतालों और अन्य बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं पर आबादी का बोझ लगातार बढ़ता गया है। इसके अलावा, सुरक्षा संबंधी चिंताओं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से फैलने वाली तरह-तरह की अफवाहों ने भी जलती आग में घी डालने का काम किया है। यही वजह है कि प्रवासियों के खिलाफ होने वाले शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन भी अब बहुत जल्द हिंसक झड़पों और दंगों में तब्दील हो जाते हैं, जिससे कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही है।
बेलफास्ट से लेकर डबलिन तक फैला भीषण हिंसा का दौर
हाल ही में उत्तरी आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट में एक सूडानी शरणार्थी से जुड़ी चाकूबाजी की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। इन दंगों के दौरान उग्र प्रदर्शनकारियों ने प्रवासियों और अल्पसंख्यक समुदायों को सीधे तौर पर निशाना बनाया, उनके घरों व दुकानों में तोड़फोड़ की और रोकने आई पुलिस पर भी भारी पथराव किया। इसी तरह, आयरलैंड के डबलिन में भी गंभीर आवास संकट और प्रवासियों की अनियंत्रित संख्या को लेकर स्थानीय लोग लगातार सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं, ब्रिटेन में भी ‘छोटी नावों’ के जरिए समुद्र पार कर आने वाले अवैध प्रवासियों और उन्हें सरकारी खर्च पर होटलों में ठहराने की नीति को लेकर टैक्सपेयर्स और आम जनता में भारी रोष देखा जा रहा है।
भारतीय प्रवासियों, छात्रों और प्रोफेशनल्स पर क्या होगा इसका असर?
यूरोप के अलग-अलग देशों में रहने वाले अधिकांश भारतीय या तो उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र हैं, या फिर आईटी प्रोफेशनल, डॉक्टर और कुशल इंजीनियर हैं। हालांकि, ये सभी वैध भारतीय नागरिक वहां की अर्थव्यवस्था के विकास में बेहद महत्वपूर्ण और सकारात्मक योगदान देते हैं, लेकिन यूरोप में बन रहे इस सामान्य ‘एंटी-माइग्रेंट’ (प्रवासी विरोधी) माहौल का सीधा और बड़ा असर भविष्य में बनने वाली इमिग्रेशन नीतियों पर पड़ना तय है।
सख्त होते वीजा नियम और वर्क परमिट में आने वाली अड़चनें
ब्रिटेन जैसे प्रमुख देश पहले ही अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अपने परिवार या आश्रितों को साथ लाने के नियमों में बड़े बदलाव कर उन्हें प्रतिबंधित कर चुके हैं। रक्षात्मक रुख अपनाते हुए यूरोपीय देश आने वाले समय में स्टूडेंट वीजा, वर्क परमिट और पढ़ाई पूरी होने के बाद मिलने वाले ‘पोस्ट-स्टडी वर्क’ (PSW) नियमों को और भी ज्यादा कड़ा कर सकते हैं। इसके अलावा, प्रवासियों की कुल संख्या को सीमित करने के राजनीतिक दबाव में वहां की सरकारें नागरिकता (Citizenship) और स्थायी निवास (PR) की कानूनी प्रक्रियाओं को और अधिक जटिल व खर्चीला बना सकती हैं।
विदेशी समुदायों के लिए सामाजिक असुरक्षा का नया माहौल
भले ही इन हिंसक प्रदर्शनों में भारतीय समुदाय को सीधे तौर पर निशाना न बनाया जा रहा हो, लेकिन सामान्य तौर पर प्रवासियों के प्रति समाज में बढ़ती नफरत और संकीर्णता किसी भी विदेशी कम्युनिटी के लिए एक मानसिक असुरक्षा का माहौल पैदा कर देती है। इससे वहां रहने वाले भारतीय परिवारों को भी सामाजिक स्तर पर भेदभाव या असहजता का सामना करना पड़ सकता है।
यूरोपीय उद्योगों की मजबूरी और एक मुश्किल संतुलन की तलाश
इस पूरे मामले का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि यूरोप की स्थानीय आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है, जिसके कारण वहां के उद्योगों को कुशल और युवा कर्मचारियों की सख्त जरूरत है। अब वहां एक अजीब सा विरोधाभास देखने को मिल रहा है; एक तरफ जहां राजनीतिक दल अपने वोट बैंक को साधने के लिए प्रवास को पूरी तरह कम करने की बातें कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ वहां के बड़े उद्योगपति विदेशी स्किल्स और टैलेंट की लगातार मांग कर रहे हैं। ऐसे में भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए अवसर पूरी तरह तो खत्म नहीं होंगे, लेकिन आने वाले समय में वीजा और इमिग्रेशन की राह पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण और संघर्षपूर्ण होने वाली है।
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