Project GIB Success : गोडावण संरक्षण की बड़ी सफलता, राजस्थान में तीन नए चूजों का जन्म

Project GIB Success : राजस्थान के थार रेगिस्तान से एक अत्यंत सुखद और उत्साहजनक खबर सामने आई है, जिसने देश भर के वन्यजीव प्रेमियों और संरक्षणवादियों के चेहरे पर मुस्कान ला दी है। भारत के सबसे दुर्लभ और गंभीर रूप से संकटग्रस्त पक्षियों में शुमार ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’, जिसे स्थानीय भाषा में ‘गोडावण’ कहा जाता है, की आबादी में इजाफा हुआ है। हाल ही में संरक्षण केंद्रों में तीन नए चूजों का सफल जन्म हुआ है, जिसके साथ ही इन संरक्षित केंद्रों में सुरक्षित गोडावणों की कुल संख्या बढ़कर 94 तक पहुंच गई है। यह उपलब्धि न केवल इन तीन चूजों के जन्म तक सीमित है, बल्कि यह उस गौरवशाली पक्षी की वापसी का संकेत है, जिसे बचाने के लिए भारत पिछले कई वर्षों से एक कठिन संघर्ष कर रहा है।

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गोडावण के अस्तित्व पर मंडराते संकट और संरक्षण की आवश्यकता

एक समय था जब राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के विशाल घास के मैदानों (ग्रासलैंड) में गोडावणों की भरमार हुआ करती थी। लेकिन, अनियंत्रित शिकार, प्राकृतिक आवासों के तेजी से विनाश, बिजली की हाई-टेंशन लाइनों से टकराकर होने वाली मौतों और मानव हस्तक्षेप के कारण इनकी संख्या रसातल में चली गई थी। स्थिति इतनी भयावह हो गई थी कि ये पक्षी विलुप्ति की दहलीज पर खड़े थे और इनका अस्तित्व केवल राजस्थान के कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गया था। इनकी गिरती आबादी को रोकने के लिए केंद्र सरकार और वन्यजीव विशेषज्ञों ने मिलकर एक महत्वाकांक्षी ‘कैप्टिव ब्रीडिंग प्रोग्राम’ (प्रजनन कार्यक्रम) शुरू किया, ताकि अंडों और चूजों को सुरक्षित माहौल में पालकर उनकी वंशवृद्धि सुनिश्चित की जा सके।

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वैज्ञानिक तकनीक से बदल रही है गोडावणों की तस्वीर

इस विशेष प्रजनन कार्यक्रम का चौथा वर्ष बेहद सफल साबित हुआ है। अब तक इस कार्यक्रम के तहत कुल 26 चूजों का जन्म हो चुका है। इन उपलब्धियों में 18 चूजों का जन्म ‘आर्टिफिशियल इनसेमिनेशन’ (कृत्रिम गर्भाधान) जैसी आधुनिक तकनीक से हुआ है, जबकि चार चूजों का जन्म प्राकृतिक प्रजनन के माध्यम से संभव हुआ है। इसके अतिरिक्त, चार अन्य चूजे उन अंडों से निकले हैं जिन्हें जोखिम भरे इलाकों से सुरक्षित निकालकर संरक्षण केंद्रों में लाया गया था। हाल ही में जन्मे तीन नए चूजों में से एक को जंगल से लाए गए अंडे से संरक्षित किया गया, जबकि दो संरक्षण केंद्रों में दिए गए अंडों से पैदा हुए हैं। विशेषज्ञों को पूरा भरोसा है कि अभी प्रजनन का सीजन जारी है और आने वाले दिनों में और भी खुशखबरी मिल सकती है।

‘जंपस्टार्ट इंटरवेंशन’ तकनीक का दिखा सकारात्मक प्रभाव

वैज्ञानिक केवल संरक्षण केंद्रों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे जंगलों में भी गोडावणों की नई पीढ़ी तैयार करने के लिए नई रणनीतियां अपना रहे हैं। इसके लिए राजस्थान में ‘जंपस्टार्ट इंटरवेंशन’ नामक तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। इसके अंतर्गत जंगल में मौजूद अंडों को सुरक्षित संरक्षण में ले लिया जाता है, जिससे उनके शिकारियों का शिकार बनने या नष्ट होने का खतरा न्यूनतम हो जाता है। इस रणनीति का असर जमीन पर दिखने लगा है और इस वर्ष जंगल में भी तीन चूजों का सफल जन्म हुआ है।

पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने की दिशा में एक बड़ा कदम

विशेषज्ञों के अनुसार, गोडावण का संरक्षण केवल एक पक्षी को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह भारत के घास के मैदानों के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को बचाने की एक व्यापक मुहिम है। गोडावण को इन घास के मैदानों की ‘फ्लैगशिप स्पीशीज़’ माना जाता है; इसका अर्थ है कि यदि यह पक्षी सुरक्षित रहेगा, तो इसके साथ ही उस पूरे प्राकृतिक तंत्र को भी संरक्षण मिलेगा जिसमें अन्य कई जीव-जंतु और दुर्लभ प्रजातियां आश्रय लेती हैं। हालांकि अभी चुनौतियां बरकरार हैं और गोडावण की यह जंग लंबी है, लेकिन प्रत्येक नया चूजा इस बात का प्रमाण है कि वैज्ञानिक सोच और ठोस प्रयासों से प्रकृति की अमूल्य धरोहरों को विलुप्ति के मुहाने से वापस लाया जा सकता है।

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Chandan Das

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