वट पूर्णिमा 2026 आज पूरे देश में श्रद्धा के साथ मनाई जा रही है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बरगद के पेड़ की पूजा किस शुभ मुहूर्त में करने से मिलता है अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद? जानिए पूजा का सही समय, विधि, महत्व और वे नियम जिन्हें भूलना नहीं चाहिए।
वट पूर्णिमा 2026 आज पूरे देश में श्रद्धा के साथ मनाई जा रही है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बरगद के पेड़ की पूजा किस शुभ मुहूर्त में करने से मिलता है अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद? जानिए पूजा का सही समय, विधि, महत्व और वे नियम जिन्हें भूलना नहीं चाहिए।

Vat Purnima 2026 : आज ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि है, जो हिंदू धर्म में अत्यंत पावन मानी जाती है। इस विशेष दिन पर सुहागिन महिलाएं ‘वट पूर्णिमा व्रत’ का पालन करती हैं। यह व्रत पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट वृक्ष (बरगद का पेड़) को साक्षात देवस्वरूप माना गया है।

ऐसी मान्यता है कि वट वृक्ष की जड़ों में सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी, तने में जगत के पालनहार भगवान विष्णु और शाखाओं में देवाधिदेव भगवान शिव का वास होता है। इसीलिए, इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा करने से तीनों देवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे महिलाओं को अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है।

वट पूर्णिमा 2026 के दिन का महत्व इसलिए और भी बढ़ गया है क्योंकि आज दो अत्यंत दुर्लभ और शुभ योग बन रहे हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, आज ‘शुभ योग’ सुबह से लेकर दोपहर 02:36 मिनट तक विद्यमान रहेगा। इसके तुरंत बाद ‘ब्रह्म योग’ की शुरुआत होगी, जो पूजा-पाठ के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। इन शुभ योगों के संगम में की गई पूजा से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
मुहूर्त की बात करें तो, आज का ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:06 से 04:46 तक रहा। इसके अलावा, दोपहर के समय ‘अभिजित मुहूर्त’ 11:57 से दोपहर 12:52 तक रहेगा, जो पूजा के लिए बहुत शुभ माना जाता है। वहीं, चंद्रोदय शाम 07:16 पर होगा, जिससे इस दिन की पूर्णता सुनिश्चित होगी।
वट पूर्णिमा का व्रत और पूजा करने की एक निश्चित प्रक्रिया है। सबसे पहले, आज के दिन भोर में उठकर स्नान-ध्यान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद, व्रत का पूर्ण संकल्प लें और मन में सावित्री-सत्यवान का स्मरण करें। पूजा की सामग्री—जैसे रोली, अक्षत, धूप, दीप, फूल, और नैवेद्य—एकत्र करके वट वृक्ष के पास जाएं। सबसे पहले बरगद के पेड़ पर शुद्ध जल अर्पित करें, फिर विधि-विधान से रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएं। पूजा का मुख्य अंग पेड़ के चारों ओर कच्चा सूत लपेटना है। लोक परंपराओं के अनुसार, कई स्थानों पर वृक्ष की सात या फिर 108 बार परिक्रमा करने का विधान है। परिक्रमा करते समय भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का ध्यान करें।

पूजा के समापन पर वट पूर्णिमा की व्रत कथा, यानी सावित्री-सत्यवान की अमर गाथा को सुनना अत्यंत अनिवार्य माना गया है। यह कथा पतिव्रता धर्म की शक्ति और अटूट प्रेम का प्रतीक है। कहा जाता है कि माता सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस छीन लिए थे, जिसके बाद से ही इस व्रत की महिमा और अधिक बढ़ गई। पूजा के अंत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें और अपनी सुखद वैवाहिक जीवन के लिए प्रार्थना करें। घर लौटने के बाद ब्राह्मणों को दान दें और अपनी क्षमतानुसार सामर्थ्य दान करें। यह व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पति-पत्नी के अटूट प्रेम और विश्वास को भी सुदृढ़ करता है।
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