Monsoon Tracker: देश के अधिकांश हिस्सों में मानसून के आगमन के बावजूद बारिश की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, 1 से 27 जून के बीच देश में सामान्य से 43 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। जहां औसत रूप से 141.8 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए थी, वहां केवल 80.4 मिलीमीटर वर्षा ही हो सकी है। विशेष रूप से मध्य भारत में 57 प्रतिशत, पूर्वोत्तर भारत में 44 प्रतिशत, दक्षिण भारत में 30 प्रतिशत और उत्तर-पश्चिम भारत में 27 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। बारिश की यह कमी न केवल कृषि क्षेत्र के लिए संकट पैदा कर रही है, बल्कि भीषण गर्मी और उमस को भी बढ़ावा दे रही है।

वैश्विक जलवायु का संकट: ‘अल नीनो’ बढ़ाएगा मुसीबत
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की हालिया रिपोर्ट ने पूरी दुनिया और विशेषकर भारत के लिए गंभीर चेतावनी जारी की है। प्रशांत महासागर के गर्म होने से उत्पन्न हो रही ‘अल नीनो’ की स्थिति जून से अगस्त के बीच 80 प्रतिशत और नवंबर तक 90 प्रतिशत तक बनी रहने की आशंका है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह जलवायु परिवर्तन की स्थिति वैश्विक स्तर पर तापमान को रिकॉर्ड स्तर पर ले जा सकती है। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देशों में पड़ रही प्रचंड गर्मी इस बात का प्रमाण है कि जलवायु संकट कितना विकराल रूप ले चुका है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी इसे ‘आग में घी’ के समान खतरनाक बताया है।

12 राज्यों के 300 जिलों पर मंडरा रहा सूखे का खतरा
अल नीनो का सीधा असर भारत की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका है। पहले जहां यह खतरा 111 जिलों तक सीमित माना जा रहा था, अब इसके दायरे में 12 राज्यों के लगभग 300 जिले आने की संभावना है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के आकलन के अनुसार, इनमें से 111 जिले ऐसे हैं जहां सिंचाई की सुविधा 25 प्रतिशत से भी कम है। इन क्षेत्रों में खरीफ की फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का खतरा सबसे अधिक है, जिससे आने वाले समय में महंगाई और खाद्य उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है।
केंद्र सरकार की तैयारी: ‘जी राम जी’ कानून और जल संरक्षण
संभावित सूखे की स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने पहले ही अलर्ट जारी कर दिया है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि संवेदनशील जिलों की पहचान कर उन्हें सूची भेजी जा चुकी है। संकट के दौरान ग्रामीण रोजगार सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने ‘जी राम जी’ कानून का सहारा लेने का संकेत दिया है। इसके अतिरिक्त, जल संरक्षण के लिए तालाबों, चेक डैम और नालों को दुरुस्त करने का व्यापक अभियान छेड़ा जा रहा है ताकि वर्षा जल को संचित किया जा सके। सरकार पेयजल संकट और पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु भी अग्रिम योजनाएं बना रही है।
भविष्य की चुनौतियां: जुलाई का महीना होगा निर्णायक
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ सप्ताह कृषि और मानसून की दिशा तय करने में निर्णायक होंगे। यदि जुलाई के दौरान भी वर्षा सामान्य से कम रहती है, तो यह देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुधन और जनजीवन के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है। फिलहाल, सरकार और संबंधित एजेंसियां पूरी सतर्कता बरत रही हैं ताकि कम बारिश के कारण होने वाले संभावित नुकसान को न्यूनतम किया जा सके। देश की जनता अब उम्मीद कर रही है कि मानसून की गति में सुधार होगा और सूखे के इस संकट को टालने में सफलता मिलेगी।
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