India Water Crisis : जल संकट का बड़ा अलर्ट, देश के 166 जलाशयों में सिर्फ 26% पानी, मचेगा हाहाकार

भारत के 166 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण अपनी क्षमता के महज 26% पर पहुंच गया है, जो कि चिंताजनक है। घटते मानसून और बढ़ते तापमान के कारण कई राज्यों में पेयजल संकट गहराने का खतरा पैदा हो गया है। प्रशासन के सामने अब शहरों की प्यास बुझाने की बड़ी चुनौती है।

India Water Crisis : देश भर में कमजोर मानसून के चलते गंभीर जल संकट और कृषि क्षेत्र में अनिश्चितता के बादल गहरा गए हैं। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, देश के 166 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण तेजी से घटकर उनकी कुल क्षमता का मात्र 26% रह गया है। 25 जून तक इन जलाशयों में कुल 48.405 अरब घन मीटर (बीसीएम) जल ही उपलब्ध था। दक्षिण और पूर्वी भारत के राज्यों में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, जहाँ जल स्तर न्यूनतम स्तर तक पहुँच गया है। यदि जुलाई के प्रारंभ में मानसूनी हवाएं सक्रिय नहीं होती हैं, तो यह स्थिति न केवल खरीफ फसलों के बुवाई चक्र को पूरी तरह से बाधित कर देगी, बल्कि कृषि लागत में भारी वृद्धि और शहरों में भीषण पेयजल संकट को भी जन्म दे सकती है।

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खरीफ फसलों की बुवाई में 23% की बड़ी गिरावट

कृषि मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जून के अंत तक खरीफ फसलों की कुल बुवाई का रकबा 182.72 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 236.46 लाख हेक्टेयर की तुलना में 23 प्रतिशत कम है। मानसून के आगमन में देरी और अपर्याप्त बारिश ने दलहन, तिलहन, मोटे अनाज और कपास जैसी महत्वपूर्ण फसलों की बुवाई को बुरी तरह प्रभावित किया है। खरीफ सीजन में आमतौर पर जून के महीने में मानसून की शुरुआत के साथ ही खेतों में हलचल शुरू हो जाती है, लेकिन इस बार प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों ने किसानों की कमर तोड़ दी है।

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धान और तिलहन के रकबे में भारी कमी

फसलों के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो स्थिति काफी गंभीर दिखती है। प्रमुख खरीफ फसल ‘धान’ का रकबा पिछले वर्ष के 34.41 लाख हेक्टेयर से घटकर 25.75 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो लगभग 25% की कमी है। सबसे बुरा असर तिलहनों पर पड़ा है, जिनका रकबा 53.33% घटकर 16.99 लाख हेक्टेयर रह गया है। इसमें भी सोयाबीन और मूंगफली की बुवाई में भारी गिरावट देखी गई है। दलहनों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है, जहाँ तूर (अरहर) की बुवाई आधे से भी कम रह गई है। हालांकि, गन्ने और पटसन के रकबे में मामूली वृद्धि देखी गई है, जो कुल बुवाई के घाटे की भरपाई करने में नाकाफी है।

अल नीनो: मानसून की कमजोरी का मुख्य कारण

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने स्पष्ट किया है कि 24 जून तक दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से 42 प्रतिशत कम दर्ज किया गया है। मध्य भारत में बारिश की कमी 59 प्रतिशत तक पहुँच गई है, जो कृषि उत्पादन के लिहाज से अत्यंत खतरनाक है। इस असामयिक सूखे के पीछे भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में बनी ‘अल नीनो’ की स्थिति मुख्य कारण है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि जून से सितंबर के दौरान अल नीनो का प्रभाव और अधिक तीव्र हो सकता है, जो मानसून की वर्षा को दीर्घकालिक रूप से बाधित कर सकता है। भारत की कृषि व्यवस्था, जो आज भी काफी हद तक वर्षा पर निर्भर है, इस जलवायु परिवर्तन के कारण एक बड़े आर्थिक और खाद्य सुरक्षा संकट के मुहाने पर खड़ी है।

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