Russia Oil Tariff: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच वैश्विक तेल बाजार में भारी अस्थिरता देखने को मिल रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ युद्ध विराम को समाप्त करने की घोषणा के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। इस बीच, भारत समेत उन देशों के लिए चिंताजनक खबर सामने आई है जो रूस से ऊर्जा संसाधनों का आयात कर रहे हैं। अमेरिका के चार प्रभावशाली सीनेटर्स ने रूस पर आर्थिक शिकंजा कसने के लिए एक नए कानून की रूपरेखा तैयार की है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य उन देशों को लक्षित करना है जो रूस से तेल, प्राकृतिक गैस और यूरेनियम जैसे पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद कर रहे हैं, क्योंकि अमेरिका का मानना है कि रूस की यह कमाई यूक्रेन युद्ध को और अधिक लंबा खींचने में ईंधन का काम कर रही है।

कानून की रूपरेखा: 500 फीसदी टैरिफ का प्रस्ताव
अमेरिकी संसद में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों दलों के सीनेटर्स—रिचर्ड ब्लूमेंथल, जीन शाहीन, लिंडसे ग्राहम और रोजर विकर—ने ट्रंप प्रशासन के साथ इस नए प्रतिबंधात्मक कानून पर सहमति व्यक्त की है। ‘सैंक्शनिंग रूस एक्ट’ के विस्तार के रूप में देखे जा रहे इस कानून का मकसद रूस के ऊर्जा निर्यात को पूरी तरह से बाधित करना है। कानून के शुरुआती मसौदे में रूस से ऊर्जा आयात करने वाले देशों के उत्पादों और सेवाओं पर 500 फीसदी तक अमेरिकी टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया था, जिसे सीनेटर ब्लूमेंथल ने ‘हड्डियां तोड़ देने वाला कदम’ करार दिया था। यद्यपि अंतिम ड्राफ्ट में टैरिफ प्रावधानों को कुछ नरम करने की चर्चा है, लेकिन रूस पर दबाव बनाने की मंशा साफ दिखाई दे रही है।

भारत पर विशेष नजर: क्या कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा?
इस प्रस्तावित कानून के दायरे में भारत पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सीनेटर लिंडसे ग्राहम जैसे नेताओं ने खुलकर भारत और चीन का नाम लेते हुए कहा है कि यदि ये देश रूस के ऊर्जा व्यापार को समर्थन देना जारी रखते हैं, तो इसके परिणामों के लिए वे स्वयं जिम्मेदार होंगे। हालांकि, इस बिल में अमेरिकी राष्ट्रपति को यह विवेकाधीन शक्ति भी दी गई है कि यदि किसी देश को छूट देना अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में हो, तो उसे 180 दिनों तक इस कार्रवाई से राहत प्रदान की जा सकती है। यह प्रावधान कूटनीतिक स्तर पर बातचीत की गुंजाइश को बनाए रखता है।
सीनेट में बढ़ता समर्थन और भविष्य की चुनौतियां
इस प्रस्तावित कानून को अमेरिकी सीनेट में 84 सीनेटर्स का व्यापक समर्थन प्राप्त है, जो इसकी गंभीरता को दर्शाता है। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी इसे रूस को बातचीत की मेज पर लाने और यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के एक प्रभावी साधन के रूप में स्वीकार किया है। हालांकि, यह प्रस्ताव पिछले एक साल से अधिक समय से चर्चा में है लेकिन अभी तक इसे पूर्ण कानून का दर्जा नहीं मिला है। आने वाले समय में, यह कानून वैश्विक ऊर्जा व्यापार की दिशा और भारत जैसे देशों की ऊर्जा सुरक्षा के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है। सीनेट और व्हाइट हाउस के बीच की यह सहमति वैश्विक स्तर पर एक बड़ा बदलाव लाने की ओर अग्रसर है।
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