Bollywood News : विवादित और बेबाक बयानों के लिए मशहूर फिल्म निर्माता राम गोपाल वर्मा ने एक बार फिर फिल्म उद्योग में सेंसर बोर्ड की भूमिका पर कड़ा प्रहार किया है। हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक विस्तृत नोट साझा करते हुए उन्होंने सेंसर बोर्ड द्वारा फिल्मों में की जाने वाली काट-छांट की कड़ी निंदा की है। वर्मा का मानना है कि फिल्मों पर सेंसरशिप लगाना वास्तव में दर्शकों, विशेषकर वयस्कों की समझ और विवेक का अपमान है। आज के स्मार्टफोन और ग्लोबल स्ट्रीमिंग के युग में यह सोचना कि सेंसर बोर्ड किसी फिल्म के दृश्यों को हटाकर दर्शकों को सच्चाई या विवादास्पद सामग्री से बचा सकता है, न केवल मूर्खतापूर्ण है बल्कि अत्यंत पुरातन सोच का प्रतीक भी है।

बालिग नागरिक को बच्चा समझना एक पाखंड है
राम गोपाल वर्मा ने अपने पोस्ट में इस विडंबना पर सवाल उठाया है कि एक ओर जहां देश का कानून 18 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों को अपना नेता चुनने, व्यावसायिक निर्णय लेने और परिवार का उत्तरदायित्व संभालने के लिए परिपक्व मानता है, वहीं दूसरी ओर उन्हें यह तय करने में ‘असमर्थ’ माना जाता है कि उन्हें सिनेमा में क्या देखना चाहिए और क्या नहीं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि एक बालिग नागरिक देश का भविष्य तय कर सकता है, तो उसे यह निर्णय लेने के लिए किसी अज्ञात कमेटी की आवश्यकता नहीं है कि कोई विशिष्ट संवाद या दृश्य उसे ‘बिगाड़’ सकता है या नहीं। वर्मा के अनुसार, सेंसर बोर्ड का यह रवैया समाज की सुरक्षा नहीं, बल्कि नागरिकों को ‘बच्चा’ समझने का एक पाखंडपूर्ण तरीका है।

डिजिटल युग में सेंसरशिप की प्रासंगिकता और विफलता
इंटरनेट और एआई (AI) के आधुनिक युग में कंटेंट को नियंत्रित करने के प्रयासों को राम गोपाल वर्मा ने एक ‘मजाक’ करार दिया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी फिल्म का कोई दृश्य सेंसर बोर्ड द्वारा काट भी दिया जाता है, तो वह कुछ ही घंटों के भीतर टोरेंट, टेलीग्राम और अन्य अंतरराष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर आसानी से उपलब्ध हो जाता है। उन्होंने फिल्म ‘ऑब्सेशन’ का उदाहरण देते हुए कहा कि सेंसर बोर्ड द्वारा हटाए गए दृश्यों को इंस्टाग्राम रील्स पर थिएटर में फिल्म देखने वालों की तुलना में कहीं अधिक लोगों ने देखा है। यह दर्शाता है कि सेंसरशिप किसी चीज को छिपाती नहीं, बल्कि दर्शकों के बीच उसके प्रति उत्सुकता और अधिक बढ़ा देती है।
फिल्मकारों को करना चाहिए अफसरशाही तंत्र का विरोध
राम गोपाल वर्मा का मानना है कि फिल्मों में कांट-छांट करने के बजाय, निर्माताओं को फिल्म के कंटेंट के प्रति पारदर्शिता बरतनी चाहिए और फैसला दर्शकों पर छोड़ देना चाहिए। उन्होंने फिल्म उद्योग के साथियों का आह्वान किया कि उन्हें उस अफसरशाही तंत्र के सामने झुकना बंद करना चाहिए, जो न तो कला की बारीकियों को समझता है और न ही दर्शकों के मानसिक स्तर को। वर्मा ने जोर दिया कि जब भी फिल्म जगत सेंसर बोर्ड की मनमानी काट-छांट को स्वीकार कर समझौता करता है, तो वह वास्तव में उन ‘गेटकीपर्स’ का हौसला बढ़ाता है, जो पूरी फिल्म इंडस्ट्री को एक आसान निशाना बनाते हैं। अंत में, उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री को एकजुट होकर सेंसर बोर्ड के मौजूदा स्वरूप को अदालतों और सार्वजनिक मंचों पर चुनौती देने का सुझाव दिया है।
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