AI Deepfake Bill: डिजिटल अरेस्ट रोकने के लिए सरकार का बड़ा कदम, संसद में आएगा नया कानून

AI Deepfake Bill:  देश में तेजी से बढ़ रहे साइबर अपराधों, विशेष रूप से ‘डिजिटल अरेस्ट’ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित ‘डीपफेक’ मामलों पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार नया कानून लाने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार, सरकार संसद के मौजूदा सत्र में एक नया विधेयक पेश कर सकती है, जिसमें इन दोनों अपराधों को अलग श्रेणी में शामिल करने का प्रस्ताव हो सकता है। इस पहल का उद्देश्य आधुनिक तकनीक के जरिए होने वाली ऑनलाइन ठगी और धोखाधड़ी पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना है।

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सुप्रीम कोर्ट ने कानून में स्पष्ट प्रावधान की जरूरत बताई

डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्तमान आपराधिक कानूनों में डिजिटल अरेस्ट और AI डीपफेक जैसे नए साइबर अपराधों की स्पष्ट कानूनी परिभाषा मौजूद नहीं है। अदालत ने माना कि तकनीक के बदलते स्वरूप को देखते हुए इन अपराधों को अलग से परिभाषित करना आवश्यक है, ताकि जांच एजेंसियों और अदालतों को कार्रवाई में स्पष्टता मिल सके।

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अदालत ने सरकार को विधायी कदम उठाने का संकेत दिया

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में अदालत जमानत देने के दौरान सख्त रुख अपना रही है। पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि इस तरह के मामलों में जबरन वसूली, धोखाधड़ी और संगठित अपराध जैसे तत्व शामिल हो सकते हैं। इसलिए ऐसे अपराधों के लिए अलग कानूनी प्रावधान और आरोपियों की संपत्ति कुर्क करने जैसे कड़े उपायों पर विचार किया जाना चाहिए।

नया अपराध घोषित करना सरकार का अधिकार

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को विशेष शक्तियां प्राप्त हैं, लेकिन अदालत स्वयं किसी नए अपराध की कानूनी परिभाषा तय नहीं कर सकती और न ही नया कानून बना सकती है। उन्होंने कहा कि यह जिम्मेदारी विधायिका और सरकार की है, इसलिए इस दिशा में आवश्यक कदम सरकार को ही उठाने होंगे।

सरकार ने संसद में विधेयक लाने के दिए संकेत

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार डिजिटल अरेस्ट और AI डीपफेक से जुड़े मामलों पर नया कानून तैयार कर रही है। प्रस्तावित विधेयक में इन दोनों अपराधों को अलग-अलग श्रेणियों में शामिल करने और दोषियों के लिए सख्त दंड का प्रावधान किए जाने की संभावना है। सरकार का मानना है कि इससे साइबर अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।

संयुक्त कार्रवाई से कम हुए डिजिटल अरेस्ट के मामले

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को जानकारी दी कि विभिन्न सरकारी एजेंसियों की संयुक्त कार्रवाई के कारण डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों में कमी दर्ज की गई है। उन्होंने बताया कि एक उच्च स्तरीय समिति इस पूरे तंत्र की समीक्षा कर रही है और जल्द ही अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी, जिसके आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।

बुजुर्ग और रिटायर्ड लोग सबसे ज्यादा निशाने पर

डिजिटल अरेस्ट और डीपफेक आधारित साइबर ठगी के मामलों में सबसे अधिक बुजुर्ग और सेवानिवृत्त नागरिक प्रभावित हो रहे हैं। साइबर अपराधी खुद को पुलिस, जांच एजेंसी या सरकारी अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं और उनकी जीवनभर की जमा पूंजी ठग लेते हैं। इन बढ़ते मामलों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जांच की जिम्मेदारी केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपी है।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी रोकथाम के प्रयासों में शामिल

सुनवाई के दौरान व्हाट्सएप की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि कंपनी भी सरकार के साथ मिलकर प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग को रोकने के लिए काम कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि नए कानून, तकनीकी निगरानी और जागरूकता अभियान के संयुक्त प्रयासों से डिजिटल अरेस्ट और डीपफेक जैसे साइबर अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकेगा।

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Chandan Das

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