Makhana Farming : मखाना आज दुनिया भर में सबसे लोकप्रिय सुपरफूड्स में गिना जाता है। व्रत-उपवास से लेकर हेल्दी डाइट अपनाने वाले लोगों तक इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। लंबे समय तक मखाना उत्पादन का नाम केवल बिहार से जुड़ा रहा, क्योंकि वैश्विक उत्पादन का लगभग 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा यहीं से आता है। लेकिन अब कृषि क्षेत्र में आई नई तकनीकों ने यह धारणा बदल दी है। आधुनिक खेती पद्धति की मदद से अब बिहार के अलावा कई अन्य राज्यों के किसान भी आसानी से मखाने की खेती कर सकते हैं और बेहतर आय अर्जित कर सकते हैं।

अब तालाब नहीं, खेतों में भी होगी मखाने की खेती
पहले माना जाता था कि मखाने की खेती केवल प्राकृतिक तालाबों, झीलों या गहरे जलाशयों में ही संभव है। हालांकि कृषि वैज्ञानिकों ने अब “फील्ड सिस्टम” नामक नई तकनीक विकसित की है, जिससे सामान्य कृषि भूमि में भी मखाना उगाया जा सकता है। इस पद्धति में खेत के चारों ओर मजबूत मेड़ बनाई जाती है ताकि पानी बाहर न निकले। इसके बाद खेत में लगभग एक से दो फीट तक पानी भरकर मखाने की खेती की जाती है। इस तकनीक ने उन किसानों के लिए भी नए अवसर खोल दिए हैं जिनके पास तालाब या झील उपलब्ध नहीं हैं।

कैसी होनी चाहिए मिट्टी और जलवायु?
विशेषज्ञों के अनुसार मखाने की खेती के लिए चिकनी या दोमट-चिकनी मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि ऐसी मिट्टी लंबे समय तक नमी बनाए रखती है। इसके अलावा खेत में पानी रोकने की क्षमता भी अच्छी होनी चाहिए। मखाने की फसल के लिए अत्यधिक ठंड की आवश्यकता नहीं होती। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा और ऐसे अन्य राज्यों में, जहां सिंचाई की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध है, वहां इसकी सफल खेती की जा सकती है। उचित तापमान और पर्याप्त जल उपलब्ध होने पर किसान अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।
कब और कैसे की जाती है बुवाई?
मखाने की खेती की शुरुआत आमतौर पर दिसंबर से जनवरी के बीच की जाती है। इस दौरान बीज सीधे खेत में डाले जाते हैं। धीरे-धीरे पौधे विकसित होते हैं और जून-जुलाई के दौरान इनमें आकर्षक नीले और बैंगनी रंग के फूल खिलने लगते हैं। इसके बाद अगस्त और सितंबर के बीच फल पानी के नीचे पकते हैं और प्राकृतिक रूप से फूटकर उनके बीज बाहर निकल आते हैं। इन बीजों को स्थानीय भाषा में “गुरी” कहा जाता है। यही बीज आगे चलकर मखाने के उत्पादन का आधार बनते हैं।
बीज से तैयार होता है सफेद मखाना
जब बीज पानी से निकाल लिए जाते हैं, तब उन्हें अच्छी तरह धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद पारंपरिक प्रक्रिया के तहत इन्हें लोहे की कड़ाही में भुना जाता है। भूनने के बाद लकड़ी के हथौड़े की सहायता से बीजों को सावधानीपूर्वक तोड़ा जाता है। जैसे ही बीज पर सही तरीके से चोट की जाती है, उसके भीतर से सफेद और गोल मखाना पॉपकॉर्न की तरह बाहर निकल आता है। यही तैयार मखाना बाजार में बिक्री के लिए भेजा जाता है।
कम लागत में बेहतर मुनाफे की संभावना
मखाने की खेती को लाभदायक कृषि व्यवसाय माना जाता है। एक एकड़ भूमि से लगभग 10 से 12 क्विंटल तक मखाना बीज प्राप्त किया जा सकता है। यदि किसानों को उचित बाजार मूल्य मिले तो इससे अच्छी आय अर्जित की जा सकती है। बढ़ती घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग के कारण मखाने की कीमतें भी आकर्षक बनी रहती हैं, जिससे किसानों की आमदनी बढ़ने की संभावना रहती है।
सरकार भी दे रही है आर्थिक सहायता
मखाना उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को प्रोत्साहन दे रही है। राष्ट्रीय मखाना विकास योजना के तहत बीज, उर्वरक, कृषि उपकरण और मशीनरी खरीदने पर लगभग 40 से 50 प्रतिशत तक सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है। इसका उद्देश्य अधिक से अधिक किसानों को इस लाभकारी फसल की ओर आकर्षित करना और बिहार के अलावा अन्य राज्यों में भी मखाना उत्पादन का विस्तार करना है।
किसानों के लिए बन सकता है आय का नया स्रोत
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक तकनीक और सरकारी सहायता के साथ मखाने की खेती किसानों के लिए अतिरिक्त आय का मजबूत माध्यम बन सकती है। यदि खेत में पर्याप्त पानी की व्यवस्था हो और वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाए, तो किसान पारंपरिक फसलों के मुकाबले बेहतर लाभ कमा सकते हैं। बदलती तकनीक के कारण अब मखाना केवल बिहार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश के कई राज्यों के किसानों के लिए यह एक उभरता हुआ लाभकारी कृषि विकल्प बन चुका है।
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