Haldwani Violence Case : सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2025 के चर्चित हल्द्वानी हिंसा मामले में मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक को मिली जमानत को बरकरार रखते हुए उत्तराखंड सरकार को बड़ा झटका दिया है। शुक्रवार को मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर हाई कोर्ट द्वारा दी गई जमानत को रद्द करने का कोई ठोस आधार नहीं बनता। इसके साथ ही उत्तराखंड सरकार की वह याचिका भी खारिज कर दी गई, जिसमें हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस फैसले के बाद अब्दुल मलिक को मिली राहत फिलहाल कायम रहेगी।

UAPA लगाने पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई गंभीर आपत्ति
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि कोई भीड़ पुलिस थाने में आग लगा देती है, तो केवल इसी आधार पर UAPA लागू नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) और आतंकवाद से संबंधित अपराधों के बीच स्पष्ट अंतर है और दोनों को एक समान मानना उचित नहीं होगा। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि आखिर किन आधारों पर इस मामले में UAPA लगाया गया और क्या इसके लिए आवश्यक कानूनी मानदंडों का पालन किया गया था।

सार्वजनिक व्यवस्था और आतंकवाद में है स्पष्ट अंतर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून व्यवस्था बिगड़ना और आतंकवादी गतिविधि दो अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं। अदालत का मानना था कि किसी हिंसक घटना में भीड़ द्वारा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना गंभीर अपराध हो सकता है, लेकिन हर ऐसे मामले में स्वतः UAPA लागू नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने संकेत दिया कि आतंकवाद विरोधी कानूनों का उपयोग केवल उन्हीं मामलों में होना चाहिए, जहां उनके लिए निर्धारित कानूनी शर्तें पूरी होती हों। अदालत की इस टिप्पणी को भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सुनाया फैसला
यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया था। पीठ ने कहा कि भले ही उत्तराखंड हाई कोर्ट के आदेश में सभी कानूनी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा नहीं की गई हो, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जमानत आदेश में हस्तक्षेप किया जाए। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता भारतीय संविधान का महत्वपूर्ण अधिकार है और जमानत से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप केवल विशेष परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर अदालत की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में न्यायालयों को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी आरोपी को हाई कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर जमानत दी है, तो केवल अलग दृष्टिकोण होने के कारण उस आदेश को रद्द नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च अदालत ने दोहराया कि जमानत और मुकदमे की सुनवाई दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं तथा जमानत का अर्थ आरोपी को दोषमुक्त घोषित करना नहीं होता।
हाई कोर्ट ने किन आधारों पर दी थी जमानत?
यह पूरा मामला उत्तराखंड हाई कोर्ट के 16 अप्रैल 2026 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें अब्दुल मलिक को नियमित जमानत प्रदान की गई थी। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जांच के दौरान उपलब्ध रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि हिंसा के समय मलिक घटनास्थल पर मौजूद नहीं था। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि इसी मामले में उसके बेटे अब्दुल मोईद सहित एक अन्य सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है। इन तथ्यों को देखते हुए हाई कोर्ट ने माना था कि आरोपी को जमानत देने से जांच या मुकदमे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका नहीं है।
हल्द्वानी हिंसा मामले में किन धाराओं में दर्ज है केस?
अब्दुल मलिक पर हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में 8 फरवरी 2024 को हुई हिंसा के संबंध में कई गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC), गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), आर्म्स एक्ट तथा अन्य दंडात्मक कानूनों के तहत आरोप लगाए गए हैं। जांच एजेंसियों का आरोप है कि इस हिंसा में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, पुलिस पर हमला हुआ और क्षेत्र में व्यापक अशांति फैली। हालांकि इन आरोपों का अंतिम निर्णय अभी ट्रायल कोर्ट में होना बाकी है।
उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी?
उत्तराखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि हाई कोर्ट ने पर्याप्त कारण बताए बिना जमानत दे दी। उन्होंने कहा कि अब्दुल मलिक कथित रूप से पूरी साजिश का मुख्य आरोपी है और उसका घटनास्थल पर शारीरिक रूप से मौजूद होना आवश्यक नहीं था। राज्य सरकार का कहना था कि यदि किसी व्यक्ति ने हिंसा की योजना बनाई हो या उसका नेतृत्व किया हो, तो उसकी भूमिका केवल मौके पर मौजूदगी से नहीं आंकी जा सकती। इसलिए हाई कोर्ट को जमानत देते समय अधिक सावधानी बरतनी चाहिए थी।
UAPA की धारा 43D(5) का भी दिया गया हवाला
राज्य सरकार ने अपनी दलील में कहा कि UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत देने के लिए कड़े मानदंड निर्धारित किए गए हैं। सरकार का तर्क था कि हाई कोर्ट ने इन कानूनी शर्तों पर पर्याप्त विचार नहीं किया और इसी कारण जमानत आदेश त्रुटिपूर्ण है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों में हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने संकेत दिया कि जमानत रद्द करने के लिए केवल अलग कानूनी व्याख्या पर्याप्त आधार नहीं हो सकती।
फिलहाल जमानत बरकरार, मुकदमे की सुनवाई जारी रहेगी
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब्दुल मलिक को मिली जमानत फिलहाल जारी रहेगी, जबकि उसके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की सुनवाई संबंधित अदालत में जारी रहेगी। सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि जमानत का फैसला मुकदमे के अंतिम परिणाम को प्रभावित नहीं करेगा। ट्रायल के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों, गवाहों और कानूनी दलीलों के आधार पर संबंधित अदालत आरोपी की दोषसिद्धि या बरी होने पर अंतिम निर्णय देगी। वहीं, सुप्रीम कोर्ट की UAPA के उपयोग को लेकर की गई टिप्पणियां भविष्य में इस कानून के इस्तेमाल से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ मानी जा सकती हैं।
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