Chausath Yogini Temple: सावन का पावन महीना शुरू होते ही देशभर में भगवान शिव की भक्ति का उत्साह चरम पर है। मंदिरों में “हर-हर महादेव” के जयघोष गूंज रहे हैं और श्रद्धालु जलाभिषेक, रुद्राभिषेक तथा बेलपत्र अर्पित कर भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं। धार्मिक मान्यता है कि सावन में श्रद्धा और विधि-विधान से की गई शिव आराधना मनोकामनाओं की पूर्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर में भी इन दिनों बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। यह मंदिर अपनी ऐतिहासिक विरासत और भगवान शिव-माता पार्वती की दुर्लभ प्रतिमा के कारण विशेष पहचान रखता है।

9वीं शताब्दी का ऐतिहासिक मंदिर, तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र
भेड़ाघाट की संगमरमर की ऊंची चट्टानों के बीच स्थित चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी में कलचुरी शासकों द्वारा कराया गया माना जाता है। उस समय यह क्षेत्र त्रिपुरी के नाम से प्रसिद्ध था और शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र माना जाता था। इतिहासकारों के अनुसार, यहां प्राचीन काल में तंत्र साधना और तंत्र विद्या का अध्ययन कराया जाता था। इसी वजह से इस मंदिर को तांत्रिक साधना का महत्वपूर्ण केंद्र भी माना जाता है। देश-विदेश से साधक यहां आध्यात्मिक साधना और ज्ञान प्राप्त करने आते थे।

64 योगिनियों के कारण पड़ा मंदिर का नाम
इस मंदिर का नाम यहां स्थापित 64 योगिनियों की प्रतिमाओं के आधार पर रखा गया। समय के साथ प्राकृतिक कारणों और अन्य परिस्थितियों में कुछ प्रतिमाएं क्षतिग्रस्त हो गईं और वर्तमान में लगभग 61 प्रतिमाएं सुरक्षित हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, इन योगिनियों को मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूप माना जाता है। मंदिर परिसर में बनी इन मूर्तियों की बारीक नक्काशी, अलंकरण और स्थापत्य शैली उस समय की उत्कृष्ट शिल्पकला का परिचय देती है। यही वजह है कि यह मंदिर धार्मिक श्रद्धालुओं के साथ-साथ इतिहास और वास्तुकला में रुचि रखने वाले लोगों को भी आकर्षित करता है।
शिव-पार्वती की अनोखी प्रतिमा बनाती है मंदिर को विशेष
मंदिर के परंपरागत महंत धर्मेंद्र पुरी गोस्वामी के अनुसार, चौसठ योगिनी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता भगवान शिव और माता पार्वती की दुर्लभ प्रतिमा है। इस प्रतिमा में दोनों विवाह मुद्रा में एक ही नंदी पर विराजमान दिखाई देते हैं। ऐसी प्रतिमा देश के अन्य शिव मंदिरों में बेहद दुर्लभ मानी जाती है। यही कारण है कि सावन और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष पूजा, रुद्राभिषेक और आरती का आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं।
नर्मदा नदी और सुवर्ण ऋषि की कथा से जुड़ी आस्था
इस मंदिर का नर्मदा नदी से भी गहरा धार्मिक संबंध माना जाता है। मंदिर परिसर से नर्मदा का मनोहारी दृश्य श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति कराता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती इस स्थान पर आए थे, जहां सुवर्ण ऋषि तपस्या कर रहे थे। ऋषि ने भगवान शिव से निवेदन किया कि वे मां नर्मदा की पूजा करके लौटने तक यहीं विराजमान रहें। बाद में उन्होंने भगवान से इसी स्थान पर स्थायी निवास का आशीर्वाद भी मांगा। यह कथा आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है।
श्रद्धालुओं को मिलता है आध्यात्मिक सुकून
मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं का कहना है कि यहां का शांत वातावरण, नर्मदा तट का प्राकृतिक सौंदर्य और भगवान शिव-पार्वती की दुर्लभ प्रतिमा मन को गहरी शांति प्रदान करती है। अनेक भक्तों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से की गई प्रार्थना भगवान शिव अवश्य सुनते हैं। इसी कारण सावन के दौरान दूर-दूर से श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में सुरक्षित धरोहर
चौसठ योगिनी मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में सुरक्षित है। लाल और बलुआ पत्थरों से निर्मित यह मंदिर सदियों बाद भी अपनी भव्यता और मजबूती बनाए हुए है। मंदिर तक पहुंचने के लिए नर्मदा तट और पंचवटी घाट की ओर से प्रमुख मार्ग उपलब्ध हैं। धार्मिक महत्व, प्राचीन वास्तुकला और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण यह स्थान मध्य प्रदेश के प्रमुख पर्यटन और आस्था केंद्रों में शामिल है।
सावन में विशेष पूजा-अर्चना का होता है आयोजन
सावन के पूरे महीने मंदिर में दुग्धाभिषेक, जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, भजन-कीर्तन और विशेष आरती का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती के दर्शन के बाद नर्मदा तट पर भी पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की कामना करते हैं। अपनी अनूठी प्रतिमा, ऐतिहासिक महत्व और धार्मिक आस्था के कारण जबलपुर का चौसठ योगिनी मंदिर सावन के दौरान शिव भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहता है।
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