Delimitation Debate: देश में लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन यानी निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन को लेकर एक बार फिर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। परिसीमन का मुद्दा आगामी वर्षों में भारतीय राजनीति और चुनावी व्यवस्था पर व्यापक असर डाल सकता है। इसी बीच राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने इस संवेदनशील संवैधानिक विषय पर अपनी राय रखी है। उन्होंने कहा कि संविधान में परिसीमन को लेकर जो व्यवस्था निर्धारित की गई है, उसे लागू किया जाना चाहिए।


संविधान के प्रावधानों पर अमल जरूरी: हरिवंश
एक साक्षात्कार में हरिवंश ने कहा कि यदि राजनीतिक दल संविधान में मौजूद प्रावधानों को लागू नहीं करना चाहते हैं, तो सभी दलों को साथ बैठकर संविधान में आवश्यक संशोधन का रास्ता अपनाना चाहिए। उनके अनुसार, किसी संवैधानिक प्रक्रिया को अनिश्चित समय तक टालते रहना उचित नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश में संवैधानिक व्यवस्थाओं को लेकर स्पष्ट निर्णय होना चाहिए, ताकि लंबे समय तक असमंजस की स्थिति बनी न रहे।

पहले भी दो बार टाली जा चुकी है परिसीमन प्रक्रिया
राज्यसभा के उपसभापति ने भारत के राजनीतिक इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया को पहले भी दो अवसरों पर आगे बढ़ाया जा चुका है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्रियों इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए परिसीमन को टालने का निर्णय लिया गया था। हरिवंश ने सवाल उठाया कि संविधान में दर्ज प्रावधानों को आखिर कितने समय तक टाला जा सकता है।
अनिर्णय की स्थिति पर उठाया सवाल
हरिवंश ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में लंबे समय तक किसी महत्वपूर्ण संवैधानिक विषय पर अनिर्णय की स्थिति उचित नहीं मानी जा सकती। उन्होंने सवाल किया कि क्या देश इस तरह की स्थिति को लगातार स्वीकार करता रहेगा। उनके मुताबिक, अगर मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में किसी तरह की समस्या है, तो राजनीतिक दलों को खुले तौर पर उस पर चर्चा करनी चाहिए और सहमति के आधार पर आगे का रास्ता तय करना चाहिए।
निष्पक्ष संवैधानिक पद की भूमिका पर दिया जोर
हरिवंश ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यसभा के उपसभापति के रूप में वह एक निष्पक्ष संवैधानिक पद पर हैं। उन्होंने कहा कि उनकी प्राथमिकता संविधान का सम्मान और उसकी व्यवस्थाओं के अनुरूप आगे बढ़ना है। उनके अनुसार, संसद के सामने दो रास्ते हो सकते हैं—पहला, मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के तहत प्रक्रिया को आगे बढ़ाना और दूसरा, सभी राजनीतिक दलों की सहमति से संविधान में बदलाव कर नई व्यवस्था तैयार करना।

महिला आरक्षण से जुड़ा है परिसीमन का मुद्दा
परिसीमन की चर्चा ऐसे समय में हो रही है जब 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को लेकर भी कई सवाल सामने हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का प्रावधान जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जुड़ा हुआ है। ऐसे में परिसीमन की प्रक्रिया का सीधा संबंध महिला आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन से भी माना जा रहा है।
लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर भी चर्चा
हाल के समय में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने से जुड़े प्रस्तावों को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में बहस देखने को मिली है। दक्षिणी राज्यों समेत कई क्षेत्रों में इस बात को लेकर चिंता जताई जाती रही है कि आबादी के आधार पर सीटों के पुनर्गठन से राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलाव हो सकता है। इसी वजह से परिसीमन का विषय केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि संघीय ढांचे से भी जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है।
आगे की रणनीति पर सभी दलों की नजर
अब राजनीतिक दलों के सामने इस संवैधानिक विषय पर स्पष्ट रुख अपनाने की चुनौती है। परिसीमन को लेकर आम सहमति बनती है या संविधान में संशोधन का रास्ता चुना जाता है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। फिलहाल हरिवंश के बयान ने इस पुराने लेकिन बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे पर राजनीतिक बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।
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