Nepal Flood: भोटेकोशी नदी में तबाही के पीछे ग्लेशियर टूटना या हिमस्खलन? वैज्ञानिक जांच में जुटे

नेपाल की भोटेकोशी नदी में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया है। शुरुआती जांच में ग्लेशियर टूटने और बड़े बर्फ-चट्टान हिमस्खलन की आशंका सामने आई है। आखिर पहाड़ों में ऐसा क्या हुआ कि नदी का बहाव अचानक तबाही में बदल गया और क्या अभी खतरा टला है?

Nepal Flood : नेपाल की भोटेकोशी नदी में बुधवार को आई विनाशकारी अचानक बाढ़ के पीछे की वजह का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक लगातार जांच कर रहे हैं। शुरुआती आकलन में ग्लेशियर टूटने, बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के खिसकने तथा मलबे के कारण नदी का प्रवाह बाधित होने की आशंका सामने आई है। माना जा रहा है कि मलबे ने ल्हेन्डे नदी को कुछ समय के लिए रोक दिया था, जिससे वहां अस्थायी बांध जैसा जलाशय बन गया। बाद में इसके टूटने से अचानक भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह निकला।

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रसुवा जिले में बाढ़ ने मचाई भारी तबाही

रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी का जलस्तर अचानक बढ़ने के बाद बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। इस आपदा में सैकड़ों लोगों की मौत की खबर सामने आई और कई इलाकों में जनजीवन प्रभावित हुआ। नदी के किनारे बने पुलों, सड़कों और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचा। रसुवागढ़ी में नेपाल-तिब्बत सीमा के नजदीक पानी का स्तर अचानक बढ़ने के बाद शुरुआती तौर पर ग्लेशियर झील फटने या हिमस्खलन को संभावित कारण माना गया था।

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वैज्ञानिकों को हिमस्खलन से जुड़े मिले संकेत

‘द काठमांडू पोस्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, उपग्रह तस्वीरों का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों को अब एक अलग घटनाक्रम के संकेत मिले हैं। प्रारंभिक विश्लेषण में पता चला है कि बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा संभवतः ल्हेन्डे नदी में गिरा। इससे नदी का रास्ता कुछ समय के लिए अवरुद्ध हो गया और पानी जमा होने लगा। इसके बाद अस्थायी बांध के टूटने से बड़ी मात्रा में पानी तेजी से आगे बढ़ा और भोटेकोशी नदी में विनाशकारी बाढ़ आ गई।

उपग्रह तस्वीरों में दिखा बड़ा हिमस्खलन

वैज्ञानिकों के अनुसार जिन उपग्रह तस्वीरों का विश्लेषण किया गया, उनमें रसुवागढ़ी सीमा पार से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व दिशा में एक बड़ा हिमस्खलन दिखाई दिया। इस घटना के दौरान भारी मात्रा में मलबा भोटेकोशी नदी की सहायक नदी ल्हेन्डे में पहुंचा होगा। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण ने भी बर्फ और चट्टानों के गिरने को बाढ़ का प्रमुख संभावित कारण माना है।

भूकंप को लेकर भी सामने आया नया आकलन

शुरुआत में अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण ने इस घटना को तिब्बत में आए 4.4 तीव्रता के भूकंप से जोड़कर देखा था। हालांकि बाद में भूकंपीय तरंगों के विस्तृत अध्ययन के आधार पर इस आकलन में बदलाव किया गया। नए विश्लेषण में संकेत मिला कि दर्ज ऊर्जा किसी सामान्य भूकंप के बजाय ग्लेशियर के ढहने और मलबे के बहाव से उत्पन्न हुई थी। बाद में इस घटना को 5.2 तीव्रता की भूकंपीय घटना के रूप में दर्ज किया गया।

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भूकंप और हिमस्खलन के बीच संबंध स्पष्ट नहीं

काठमांडू विश्वविद्यालय के जलवायु शोधकर्ता एवं प्रोफेसर रिजन भक्त कायस्थ के मुताबिक, उपलब्ध संकेतों से ऐसा प्रतीत होता है कि बाढ़ से पहले हिमस्खलन ने ल्हेन्डे नदी का रास्ता रोक दिया था। उसी समय भूकंपीय गतिविधि भी दर्ज हुई थी, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि भूकंप ने हिमस्खलन को शुरू करने में कोई भूमिका निभाई थी या नहीं। वैज्ञानिक इस संबंध को समझने के लिए अतिरिक्त आंकड़ों का अध्ययन कर रहे हैं।

विशेषज्ञ बोले, पूरी तस्वीर साफ होने में समय लगेगा

अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) के विशेषज्ञ सार्थक श्रेष्ठ ने कहा कि अभी तक मिले प्रमाण नेपाल की ओर हुए हिमस्खलन को बाढ़ का मुख्य कारण बताते हैं। हालांकि घटना का पूरा क्रम समझने में एक से दो सप्ताह का समय लग सकता है। ICIMOD वास्तविक घटनाक्रम की विस्तृत जानकारी जुटाने के लिए चीनी संस्थानों के साथ भी सहयोग कर रहा है।

महज आधे घंटे में नौ मीटर बढ़ा नदी का जलस्तर

ICIMOD के प्रारंभिक आकलन के अनुसार बाढ़ बेहद तेज और असामान्य रूप से शक्तिशाली थी। गल्छी क्षेत्र में त्रिशूली नदी का जलस्तर केवल 30 मिनट में करीब नौ मीटर बढ़ गया। वहीं मलेखु में जलस्तर लगभग सात मीटर तक बढ़ा। जलस्तर में इतनी तेज वृद्धि ने बाढ़ की भयावहता को और बढ़ा दिया तथा नदी किनारे मौजूद लोगों और बुनियादी ढांचे को संभलने का पर्याप्त समय नहीं मिल सका।

भविष्य में भी अचानक बाढ़ का खतरा बरकरार

विशेषज्ञों ने भविष्य में ऐसी घटनाओं की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया है। खराब मौसम और बादलों के कारण उपग्रहों से ऊंचाई वाले क्षेत्रों की निगरानी में भी दिक्कत आ रही है। इसलिए ऊपरी हिस्सों में किसी अन्य अस्थायी जलाशय के बनने की आशंका पर लगातार नजर रखी जा रही है।

बढ़ते तापमान से बढ़ रहा हिमालयी खतरा

प्रोफेसर कायस्थ के अनुसार बढ़ते तापमान के कारण हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने, बर्फ और चट्टानों के टूटने तथा हिमस्खलन की घटनाओं का जोखिम बढ़ रहा है। हालांकि अगली ऐसी घटना कब और किस स्थान पर होगी, इसका सटीक अनुमान लगाना अभी संभव नहीं है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में लगातार निगरानी और बेहतर आपदा चेतावनी प्रणाली भविष्य में जान-माल के नुकसान को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

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