BRICS Summit 2026 : भारत और चीन के रिश्ते लंबे समय से भरोसे और प्रतिस्पर्धा के बीच झूलते रहे हैं। एशिया की दोनों बड़ी शक्तियों के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग जरूरी है, लेकिन सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण विश्वास की कमी बनी हुई है। नई दिल्ली में होने वाला आगामी BRICS शिखर सम्मेलन दोनों देशों के रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश का अहम मंच बन सकता है।
2019 के बाद भारत आएंगे शी जिनपिंग
11 से 13 सितंबर तक प्रस्तावित BRICS Summit में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नई दिल्ली पहुंचने की उम्मीद है। वर्ष 2019 के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी। ऐसे समय में उनकी यात्रा काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि मोदी और शी की पिछली भारत में आमने-सामने मुलाकात पूर्वी लद्दाख में सैन्य तनाव से पहले हुई थी।
गलवान के बाद रिश्तों में आया बड़ा बदलाव
जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने भारत-चीन संबंधों को दशकों के सबसे कठिन दौर में पहुंचा दिया था। इसके बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर दोनों देशों ने बड़ी संख्या में सैनिक तैनात किए। भारत ने चीनी निवेश और तकनीक की जांच भी सख्त कर दी। नई दिल्ली का लगातार कहना रहा कि सीमा पर शांति के बिना द्विपक्षीय रिश्तों में पूर्ण सामान्य स्थिति संभव नहीं है।
2024 में शुरू हुई रिश्तों में नरमी
अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के बीच पूर्वी लद्दाख के डेपसांग और डेमचोक में पेट्रोलिंग को लेकर समझौता हुआ। इसके बाद दोनों क्षेत्रों में गश्त की व्यवस्था बहाल करने का रास्ता खुला। इसी घटनाक्रम के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग ने कजान में BRICS सम्मेलन के दौरान मुलाकात की। इसे उच्चस्तरीय बातचीत दोबारा शुरू करने की दिशा में अहम कदम माना गया।
BRICS बना संवाद का महत्वपूर्ण मंच
BRICS ऐसा अंतरराष्ट्रीय मंच है जहां भारत और चीन प्रतिद्वंद्वी सैन्य गठबंधनों के प्रतिनिधि के बजाय बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के रूप में साथ बैठते हैं। भारत के लिए यह मंच रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखने का माध्यम है, जबकि चीन इसे ग्लोबल साउथ में अपना प्रभाव बढ़ाने के अवसर के तौर पर देखता है। दोनों देशों को यहां सहयोग के लिए पूर्ण विश्वास नहीं, बल्कि सीमित सहमति की जरूरत है।
अमेरिका के साथ भारत की रणनीति
भारत ने अमेरिका के साथ क्वाड और रक्षा सहयोग जैसी साझेदारियों को मजबूत किया है, लेकिन वह चीन के खिलाफ किसी गठबंधन का हिस्सा बनने से बचता रहा है। वहीं चीन अमेरिका के नेतृत्व वाले इंडो-पैसिफिक सुरक्षा ढांचे को चुनौती मानता है। दोनों देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थन करते हैं, लेकिन भारत चीन के नेतृत्व वाली व्यवस्था नहीं चाहता।
LAC विवाद अभी भी बड़ी चुनौती
भारत-चीन संबंधों को पूरी तरह सामान्य बनाने में सबसे बड़ी बाधा अभी भी LAC विवाद है। 2024 का पेट्रोलिंग समझौता महत्वपूर्ण जरूर रहा, लेकिन इससे सीमा विवाद का स्थायी समाधान नहीं हुआ। गलवान और पैंगोंग त्सो जैसे संवेदनशील इलाकों में सैन्य स्थिति को लेकर कई सवाल अभी बाकी हैं। दोनों देशों के बीच राजनयिक और सैन्य स्तर पर बातचीत जारी है।
आर्थिक रिश्तों में भी सावधानी बरकरार
भारत और चीन के बीच व्यापारिक निर्भरता काफी गहरी है। चीन से भारत बड़ी मात्रा में मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक सामान आयात करता है। हालांकि, 2020 के बाद नई दिल्ली ने रणनीतिक निर्भरता कम करने के लिए निवेश और तकनीकी क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई है। इसका संकेत आर्थिक सहयोग से जुड़े कई संवेदनशील फैसलों में भी मिलता है।
दोस्ती नहीं, स्थिर प्रतिस्पर्धा संभव
मौजूदा परिस्थितियों में भारत और चीन के बीच तत्काल दोस्ती की संभावना कम है। दोनों देशों के सीमा विवाद, क्षेत्रीय प्रभाव और रणनीतिक हित अलग-अलग हैं। ऐसे में ज्यादा व्यावहारिक रास्ता प्रतिस्पर्धा के साथ सह-अस्तित्व का हो सकता है। इसका मतलब है कि दोनों देश मतभेदों के बावजूद बातचीत जारी रखें और किसी घटना को बड़े सैन्य संकट में बदलने से रोकें।
BRICS Summit की असली परीक्षा
नई दिल्ली BRICS Summit की सफलता केवल मोदी और शी की मुलाकात या हाथ मिलाने से तय नहीं होगी। असली परीक्षा यह होगी कि क्या दोनों देश LAC पर स्थिरता बनाए रखने, आर्थिक रिश्तों को नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाने और नियमित संवाद कायम रखने में सफल होते हैं। यदि ऐसा होता है, तो भारत और चीन दोस्त भले न बनें, लेकिन स्थिर और जिम्मेदार प्रतिद्वंद्वी जरूर बन सकते हैं।
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