UPI Charge Controversy : यूपीआई लेनदेन पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस तेज हो गई है। यह विवाद अब वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति में हुई चर्चाओं और उसकी सिफारिशों तक पहुंच गया है। सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि समिति ने UPI के लिए एक स्तरीय राजस्व और MDR ढांचे की जरूरत पर जोर दिया था, जबकि कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि हाल में घोषित शुल्क से जुड़ा कोई विशिष्ट प्रस्ताव समिति के सामने चर्चा के लिए नहीं रखा गया था।
सरकार ने कांग्रेस सांसदों की मौजूदगी का दिया हवाला
सरकारी पक्ष के अनुसार, वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने UPI के लिए टिकाऊ राजस्व मॉडल की जरूरत पर विचार किया था। सरकार से जुड़े सूत्रों ने कहा कि 12 अगस्त को समिति की रिपोर्ट अपनाए जाने के समय कांग्रेस के पांच सांसद पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ मौजूद थे। सूत्रों के मुताबिक, प्रकाशित कार्यवाही में इन सांसदों की ओर से कोई असहमति दर्ज नहीं की गई थी।
कांग्रेस सांसद गोगोई ने दावे को बताया अलग
कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने सरकार के दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि समिति ने उस विशेष UPI शुल्क प्रस्ताव पर चर्चा नहीं की थी, जिसे अब लागू किए जाने की बात कही जा रही है। उनके अनुसार, वित्त विभाग के अधिकारियों के साथ हुई बातचीत में UPI पर हालिया शुल्क से संबंधित कोई स्पष्ट प्रस्ताव, दर या विस्तृत व्यवस्था समिति के सामने नहीं रखी गई थी। उन्होंने कहा कि समिति के सदस्यों ने MDR की जरूरत और उसके औचित्य से जुड़े सवाल जरूर उठाए थे।
मनीष तिवारी ने भी कांग्रेस के दावे का समर्थन किया
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी गोगोई के बयान का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि संसदीय स्थायी समितियों की कार्यवाही गोपनीय होती है और उसका इस्तेमाल राजनीतिक बहस में किसी पक्ष के समर्थन का दावा करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। तिवारी के अनुसार, समिति के सामने UPI लेनदेन पर हालिया MDR व्यवस्था से संबंधित कोई विशिष्ट प्रस्ताव नहीं रखा गया था।
MDR के सिद्धांत पर चर्चा और प्रस्ताव में अंतर
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि समिति में UPI के लिए राजस्व मॉडल या MDR की आवश्यकता जैसे व्यापक मुद्दों पर चर्चा हो सकती है, लेकिन इसे मौजूदा शुल्क व्यवस्था के विशिष्ट प्रस्ताव की स्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वहीं सरकारी पक्ष समिति की रिपोर्ट में दर्ज सिफारिशों और उसके पारित होने के दौरान दर्ज असहमति नहीं होने को अपने पक्ष में महत्वपूर्ण तथ्य बता रहा है।
UPI शुल्क व्यवस्था को लेकर क्या है मौजूदा स्थिति?
मौजूदा विवाद उस व्यवस्था से जुड़ा है जिसके तहत 2,000 रुपये से अधिक के कुछ व्यापारी UPI लेनदेन पर MDR लागू किया जाना है। रिपोर्टों के अनुसार, नई व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से लागू होनी है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि व्यक्ति-से-व्यक्ति यानी P2P भुगतान पर इसका असर नहीं होगा और निर्धारित सीमा तक कई छोटे व्यापारी लेनदेन भी शुल्क से बाहर रहेंगे।
राजनीतिक दावों के बीच क्या है मुख्य मुद्दा?
इस पूरे विवाद में मुख्य सवाल यह है कि संसदीय समिति की सिफारिशों को मौजूदा UPI MDR व्यवस्था के समर्थन के रूप में देखा जाए या नहीं। सरकार समिति की रिपोर्ट और उसमें दर्ज सिफारिशों का हवाला दे रही है, जबकि कांग्रेस के सांसद कह रहे हैं कि हालिया विशिष्ट शुल्क प्रस्ताव पर समिति में चर्चा नहीं हुई थी। ऐसे में UPI MDR को लेकर सरकार और विपक्ष के दावों के बीच अंतर फिलहाल राजनीतिक बहस का प्रमुख मुद्दा बना हुआ है।
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