Supreme Court on NSA: स्टूडेंट एक्टिविस्ट आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत हिरासत में लिए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत के सामने मुख्य सवाल गौतमबुद्ध नगर की तत्कालीन जिलाधिकारी मेधा रूपम की व्यक्तिगत जिम्मेदारी से जुड़ा रहा। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि यदि हिरासत का निर्णय कई अधिकारियों की जांच और मंजूरी के बाद लिया गया था, तो केवल डीएम को इसके लिए जिम्मेदार ठहराने पर विचार करना होगा।
जस्टिस एससी शर्मा और एनके सिंह की पीठ ने की सुनवाई
मामले की सुनवाई जस्टिस एससी शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने की। मेधा रूपम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें आकृति चौधरी की NSA के तहत हिरासत को गलत ठहराते हुए रद्द कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने इसके साथ ही डीएम की सैलरी से पांच लाख रुपये काटकर आकृति चौधरी को मुआवजा देने का निर्देश भी दिया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को दी गई चुनौती
हाईकोर्ट के फैसले के बाद मेधा रूपम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उनकी याचिका में यह सवाल उठाया गया कि क्या हिरासत की पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों के बजाय केवल जिलाधिकारी को व्यक्तिगत रूप से आर्थिक दंड के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान इसी मुद्दे पर दोनों पक्षों ने अपनी दलीलें रखीं।
यूपी सरकार ने बताया- डीएम ने अकेले नहीं लिया फैसला
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत में दलील दी कि मेधा रूपम ने अपने स्तर पर सीधे तौर पर हिरासत का निर्णय नहीं लिया था। उनके सामने जो रिपोर्ट पेश की गई थी, वह पुलिस विभाग के विभिन्न वरिष्ठ अधिकारियों की प्रक्रिया से होकर आई थी। इसमें SHO, DCP और पुलिस कमिश्नर स्तर की रिपोर्ट भी शामिल थी।
NSA की सलाहकार बोर्ड ने भी मामले की समीक्षा की
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि हिरासत की प्रक्रिया केवल जिलाधिकारी के स्तर पर समाप्त नहीं हुई थी। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गठित सलाहकार बोर्ड ने भी मामले की समीक्षा की थी। सरकार का तर्क था कि पूरी प्रक्रिया में कई अधिकारियों और संस्थागत स्तरों की भूमिका रही, इसलिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी निर्धारित करते समय पूरे घटनाक्रम को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
मेधा रूपम के पक्ष ने पांच स्तर की प्रक्रिया बताई
मेधा रूपम की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि डीएम के सामने निर्णय पहुंचने से पहले पांच स्तरों पर प्रक्रिया पूरी हुई थी। उनके अनुसार जिलाधिकारी के सामने उपलब्ध रिकॉर्ड, रिपोर्ट और कानूनी प्रावधानों के आधार पर अपनी राय बनाने की जिम्मेदारी थी। इसलिए व्यक्तिगत तौर पर डीएम को पूरे फैसले के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में क्या कहा
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि हिरासत का फैसला नीचे से ऊपर तक कई स्तरों की जांच और प्रक्रिया के बाद लिया गया था, तो केवल एक अधिकारी को अलग करके जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने संकेत दिया कि पांच लाख रुपये के मुआवजे की जिम्मेदारी तय करते समय निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया पर विचार करना जरूरी है।
अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब अदालत के अंतिम निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि आकृति चौधरी की NSA हिरासत के मामले में मेधा रूपम को व्यक्तिगत रूप से पांच लाख रुपये के मुआवजे के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है या नहीं। फिलहाल मामले में अंतिम फैसला आना बाकी है।
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