RK Singh on SIR : स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी बहस के बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता आरके सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। आरके सिंह ने सोशल मीडिया पर एक लंबा खुला पत्र साझा करते हुए SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम से जुड़े कई आरोप लगाए। उनके दावों पर स्वतंत्र रूप से निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है और चुनाव आयोग ने SIR से जुड़े अपने प्रमुख फैसलों को सर्वसम्मत बताया है।
SIR के कानूनी आधार को लेकर उठाया सवाल
आरके सिंह ने अपने पत्र में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 का उल्लेख करते हुए दावा किया कि विशेष पुनरीक्षण के लिए परिस्थितियों और प्रक्रिया का पालन जरूरी है। उन्होंने सवाल उठाया कि पूरे देश में SIR लागू करने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया और क्या यह फैसला पूरी चुनाव आयोग की सहमति से हुआ। यह सवाल ऐसे समय में सामने आया है जब चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर मीडिया रिपोर्टों में दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का उल्लेख हुआ है।
चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का भी किया जिक्र
द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों पर रिकॉर्ड में 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, फॉर्म में बदलाव और डेटा के केंद्रीकरण सहित कई मुद्दों का उल्लेख किया गया। हालांकि चुनाव आयोग ने बाद में कहा कि SIR समेत उसके प्रमुख फैसले तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए।
मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल
आरके सिंह ने आरोप लगाया कि SIR के दौरान पुराने मतदाता रिकॉर्ड में मौजूद कई नाम हटाए गए और कुछ मामलों में अपील लंबित रहने के बावजूद नई सूची का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 22 का हवाला देते हुए कहा कि मतदाता का नाम हटाने की प्रक्रिया में संबंधित ERO की भूमिका और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि 2003 के बाद मतदाता सूची में जुड़े कई लोगों को पर्याप्त जांच और नोटिस के बिना प्रभावित किया गया।
वोटर पर पात्रता साबित करने का बोझ डालने का आरोप
आरके सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी मामले का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, किसी मतदाता की पात्रता पर सवाल उठने पर संबंधित प्राधिकरण या आपत्ति दर्ज कराने वाले पक्ष को अपने दावे का आधार और प्रमाण देना चाहिए। उनका आरोप है कि SIR प्रक्रिया में इसके उलट कई मतदाताओं को स्वयं अपनी पात्रता साबित करने के लिए दस्तावेज जमा करने पड़े।
Form 6 को लेकर भी आरके सिंह ने उठाए सवाल
आरके सिंह ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में जोड़े गए अतिरिक्त विवरण पर भी सवाल उठाया। उनके मुताबिक, नए मतदाताओं से 2003 की मतदाता सूची में माता-पिता के नाम और संबंधित क्रमांक जैसी जानकारी मांगी गई। उन्होंने सवाल किया कि 2026 में 18 वर्ष का कोई व्यक्ति इतनी पुरानी मतदाता सूची तक कैसे पहुंचेगा। Form 6 में बदलावों को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित आपत्तियों का भी रिपोर्टों में उल्लेख हुआ है।
गरीब और दस्तावेजविहीन लोगों पर असर का दावा
आरके सिंह ने आरोप लगाया कि दस्तावेजों की मांग से गरीब, मजदूर और दूसरे राज्यों में काम करने वाले लोगों को अधिक परेशानी हो सकती है। उनका कहना है कि कई परिवारों के पास जन्म प्रमाणपत्र या पुराने दस्तावेज नहीं होते। ऐसे में रोजाना कमाकर जीवन चलाने वाले लोगों के लिए दस्तावेज जुटाना और निर्धारित प्रक्रिया पूरी करना कठिन हो सकता है। ये आरके सिंह द्वारा व्यक्त चिंताएं हैं, जिन्हें स्वतंत्र आंकड़ों से प्रमाणित करना जरूरी है।
Form 7 और आपत्तियों को लेकर सवाल
मतदाता का नाम हटाने के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 7 को लेकर भी आरके सिंह ने सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि बड़ी संख्या में नाम हटाने के लिए दाखिल की गई आपत्तियां किसने कीं और अधिकारियों ने उन्हें किन आधारों पर स्वीकार किया। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या संबंधित मतदाताओं को इन आपत्तियों के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई और क्या उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर मिला।
पश्चिम बंगाल के मतदाताओं का भी किया जिक्र
आरके सिंह ने पश्चिम बंगाल में उन मतदाताओं का भी उल्लेख किया, जिनके नाम को लेकर प्रक्रिया और अपील से जुड़े विवाद सामने आए हैं। उन्होंने दावा किया कि बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके। हालांकि इन आंकड़ों और उनके कारणों की स्थिति संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड तथा दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया के आधार पर ही स्पष्ट हो सकती है।
‘Logical Discrepancy’ पर भी जताई आपत्ति
SIR में इस्तेमाल किए जा रहे ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ यानी तार्किक विसंगति के आधार पर भी आरके सिंह ने सवाल उठाया। उनका कहना है कि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में उम्र से जुड़े रिकॉर्ड कई बार अनुमान के आधार पर दर्ज होते हैं। माता-पिता और बच्चों की उम्र में अंतर कम या अधिक होने पर रिकॉर्ड में विसंगति सामने आ सकती है। आरके सिंह का तर्क है कि ऐसे मामलों में दस्तावेजों के साथ मानवीय सुनवाई भी जरूरी है।
13 करोड़ नामों को लेकर किया दावा
आरके सिंह ने अपने पत्र में दावा किया कि SIR के दौरान अब तक करीब 13 करोड़ नाम ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से हटाए गए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट भी 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR के दौरान ड्राफ्ट रोल से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने का उल्लेख करती है। हालांकि ड्राफ्ट सूची से किसी नाम का हटना हमेशा स्थायी रूप से मताधिकार समाप्त होने के समान नहीं है; दावे, आपत्तियां और अपील की प्रक्रियाएं उपलब्ध हैं।
ECINET के केंद्रीकरण पर भी सवाल
आरके सिंह ने चुनाव आयोग के ECINET और मतदाता डेटा के केंद्रीकरण को लेकर भी चिंता जताई। उनका आरोप है कि डिजिटल सिस्टम में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ जैसे मामलों के कारण अधिकारियों की भूमिका प्रभावित हुई। इसी विवाद के बीच चुनाव आयोग ने ECINET की तकनीकी समीक्षा के लिए समिति गठित करने का फैसला किया है। आयोग ने SIR प्रक्रिया में नोटिस पाने वाले मतदाताओं के लिए भी प्रक्रिया आसान करने की घोषणा की है।
चुनाव आयोग ने सर्वसम्मति से फैसले की बात कही
चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को स्पष्ट किया कि SIR और उससे जुड़े प्रमुख फैसले आयोग के तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने ECINET की समीक्षा, कुछ मामलों में सुनवाई प्रक्रिया आसान करने और मतदाताओं को दस्तावेज जमा करने के लिए अतिरिक्त सुविधाएं देने जैसे कदमों की जानकारी दी। नोटिस वाले मतदाताओं के मामलों में BLO को घर जाकर दस्तावेज लेने और उन्हें सिस्टम पर अपलोड करने की सुविधा भी दी गई है।
विपक्षी दलों से आरके सिंह ने की बड़ी अपील
आरके सिंह ने अपने पत्र में विपक्षी दलों से एकजुट होकर चुनाव प्रक्रिया को लेकर विरोध दर्ज कराने की अपील की। उन्होंने CEC और चुनाव आयुक्तों के इस्तीफे तथा नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की मांग का समर्थन किया। उन्होंने कुछ राज्यों में लंबित अपीलों और मतदाता सूची से जुड़े मामलों के कारण चुनाव दोबारा कराने की मांग भी रखी। ये उनके राजनीतिक और संस्थागत सुझाव हैं, न कि चुनाव आयोग या न्यायपालिका द्वारा स्वीकार किए गए निष्कर्ष।
EVM पर भी उठाया इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम का मुद्दा
आरके सिंह ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM को लेकर भी अपनी आपत्ति दर्ज की। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को लेकर सुरक्षा संबंधी सवाल बने रहते हैं और बैलेट पेपर से मतदान की मांग की। दूसरी ओर, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने हाल में EVM की सुरक्षा पर भरोसा जताते हुए कहा था कि EVM को हैक नहीं किया जा सकता।
नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की मांग
आरके सिंह ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति व्यवस्था को लेकर भी बदलाव का सुझाव दिया। उन्होंने ऐसी चयन प्रक्रिया की मांग की जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसे संस्थागत प्रतिनिधियों की भूमिका हो। उनका कहना है कि इससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निर्णय प्रक्रिया को लेकर भरोसा मजबूत किया जा सकता है।
SIR विवाद में आगे भी जारी रहेगी कानूनी बहस
SIR को लेकर अब राजनीतिक आरोपों के साथ-साथ कानूनी और तकनीकी सवाल भी चर्चा में हैं। एक याचिका में ECINET और ERONET सिस्टम की तकनीकी तथा प्रशासनिक जांच की मांग भी की गई है। वहीं चुनाव आयोग अपनी प्रक्रिया को कानूनी अधिकारों और निर्धारित नियमों के अनुरूप बता रहा है। ऐसे में मतदाता सूची में नामों को लेकर अंतिम स्थिति दावे-आपत्तियों, अपील और संबंधित आधिकारिक प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
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