Somvati Amavasya : सनातन परंपरा और हिंदू धर्म में हर व्रत, त्योहार, दिन और तिथि का अपना एक अलग और गहरा महत्व बताया गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार, कृष्ण पक्ष की वह अंतिम तिथि जब आकाश में चंद्रमा के दर्शन बिल्कुल नहीं होते हैं, उसे अमावस्या कहा जाता है। भारतीय संस्कृति में अमावस्या को एक अत्यंत पवित्र और ऊर्जावान दिन माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या की यह पावन तिथि विशेष रूप से पितरों (पूर्वजों) की शांति, तर्पण, स्नान और दान-पुण्य के कार्यों के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। इसके अलावा, जब यह अमावस्या तिथि सोमवार के दिन पड़ती है, तो इसका महत्व कई गुना अधिक बढ़ जाता है और इसे ‘सोमवती अमावस्या’ के नाम से जाना जाता है।

15 जून 2026 को बन रहा है सोमवती अमावस्या का महासंयोग
हिंदू पंचांग की सटीक गणनाओं के अनुसार, 15 जून 2026, दिन सोमवार को ज्येष्ठ अधिक मास की अमावस्या का यह अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग बनने जा रहा है। हिंदू धर्म में अधिक मास (जिसे मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं) का विशेष आध्यात्मिक महत्व होता है। अधिक मास होने के कारण इस सोमवती अमावस्या का पुण्य फल और भी अधिक प्रभावशाली हो जाता है।
ज्योतिष और धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि इस विशेष दिन पर यदि कुछ खास उपाय और विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाए, तो जातक को न केवल अपने पितरों का बल्कि भगवान शिव और धन की देवी माता लक्ष्मी का भी अखंड आशीर्वाद और कृपा प्राप्त होती है।
पितरों के आशीर्वाद और शांति के लिए करें ये विशेष उपाय
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ अधिक मास की इस सोमवती अमावस्या के दिन पितरों को पूर्ण रूप से तृप्त करने के लिए निम्नलिखित उपाय अवश्य करने चाहिए:
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पवित्र स्नान: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर किसी पवित्र नदी, सरोवर या तीर्थ स्थल पर जाकर स्नान करें। यदि यह संभव न हो तो नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
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तर्पण कर्म: स्नान के पश्चात, पवित्र जल में काले तिल और सफेद पुष्प डालकर अपने पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक तर्पण करना चाहिए।
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मंत्र जाप: इस दिन पितृ गायत्री मंत्र – ‘ॐ पितृभ्य: स्वधायिभ्यो नम:’ का लगातार जप करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
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गीता पाठ: यदि कोई व्यक्ति श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का पाठ करके उसका पुण्य अपने पितरों को अर्पित करता है, तो उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और पितृ दोष शांत होता है।
अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए पीपल के पेड़ की परिक्रमा
सनातन धर्म के वैदिक ग्रंथों में पीपल के वृक्ष को अत्यंत पूजनीय और देवतुल्य माना गया है। ऐसी गहरी मान्यता है कि पीपल के वृक्ष के मूल (जड़) में भगवान श्री हरि विष्णु, तने में देवाधिदेव महादेव शिव और अग्र भाग (पत्तों) में सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी का साक्षात् वास होता है।
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चूंकि सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित होता है, इसलिए सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ की पूजा का विशेष महत्व है।
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सुहागिन महिलाओं को अपने अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु की कामना के लिए पीपल के वृक्ष में भगवान शिव का वास मानते हुए उसकी पूरे विधि-विधान से पूजा और परिक्रमा करनी चाहिए।
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अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार किसी गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, वस्त्र, ताजे फल और मीठे जल का दान अवश्य करना चाहिए।
सुख-समृद्धि के लिए अमावस्या की रात करें मां लक्ष्मी की आराधना
अमावस्या की यह पावन तिथि केवल पितरों की शांति के लिए ही नहीं, बल्कि धन और ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए भी एक अबूझ और अचूक मुहूर्त मानी जाती है। अधिक मास की इस अमावस्या के दिन माता लक्ष्मी की विशेष कृपा पाने के लिए इन बातों का ध्यान रखें:
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स्वच्छता का ध्यान: घर की अच्छी तरह से साफ-सफाई करें और शाम के समय घर के हर एक कोने में प्रकाश की उचित व्यवस्था करें।
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दीपदान: संध्याकाल में घर के मुख्य द्वार पर घी या तेल का दीपक अवश्य जलाएं। मान्यता है कि अमावस्या के अंधकार में यह दीपक मां लक्ष्मी को घर में आमंत्रित करता है।
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विशेष पाठ: माता लक्ष्मी की प्रतिमा के सामने बैठकर ‘लक्ष्मी अष्टकम्’ अथवा ‘श्री सूक्त’ का पूरी श्रद्धा के साथ पाठ करें। इससे घर की दरिद्रता दूर होती है और सुख, शांति एवं समृद्धि का स्थायी वास होता है।
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