Afghanistan 2030
Afghanistan 2030: अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता पर काबिज होने के बाद से देश एक ऐसे मानवीय और सामाजिक संकट की ओर बढ़ रहा है, जिसकी भरपाई करना भविष्य में नामुमकिन हो सकता है। महिलाओं की शिक्षा और उनके काम करने के अधिकार पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने देश की नींव को हिलाकर रख दिया है। यूनिसेफ (UNICEF) की एक हालिया और बेहद चिंताजनक रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि ये पाबंदियां तुरंत नहीं हटाई गईं, तो साल 2030 तक अफगानिस्तान की स्थिति बद से बदतर हो जाएगी। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्र पूरी तरह ध्वस्त होने की कगार पर हैं, जिसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।
तालिबान शासन ने लड़कियों की शिक्षा को महज 12 वर्ष की आयु (प्राथमिक स्तर) तक सीमित कर दिया है, जिसके कारण उच्च शिक्षा के द्वार उनके लिए पूरी तरह बंद हो चुके हैं। यूनिसेफ के आंकड़ों के अनुसार, इस कठोर नीति का सीधा असर पहले ही 10 लाख से अधिक लड़कियों पर पड़ चुका है। रिपोर्ट में अंदेशा जताया गया है कि यदि वर्तमान नीतियां जारी रहीं, तो 2030 तक प्रभावित लड़कियों की यह संख्या बढ़कर दोगुनी हो सकती है। इसके अलावा, महिलाओं को लगभग सभी सरकारी नौकरियों से बेदखल कर दिया गया है, जिससे देश का एक बड़ा बौद्धिक हिस्सा घर बैठने पर मजबूर है।
27 अप्रैल को जारी हुई इस रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, पाबंदियों के चलते अगले कुछ वर्षों में देश में योग्य महिला पेशेवरों की भारी कमी हो जाएगी। अनुमान है कि 2030 तक अफगानिस्तान से लगभग 20,000 महिला शिक्षक और 5,400 महिला स्वास्थ्य कर्मी कार्यबल से गायब हो सकते हैं। यह संख्या 2021 के कुल कार्यबल का लगभग 25 प्रतिशत है। यूनिसेफ ने तालिबान से पुरजोर अपील की है कि वे 2021 में सत्ता में लौटने के बाद लगाए गए इन प्रतिगामी फैसलों को वापस लें, अन्यथा देश में ‘मानव संसाधन’ का अकाल पड़ जाएगा।
अफगानिस्तान की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पहले से ही विदेशी मदद पर निर्भर रही है, लेकिन अब महिला स्वास्थ्य कर्मियों की कमी इसे पूरी तरह खत्म कर देगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2035 तक देश में 9,600 से अधिक महिला स्वास्थ्य कर्मियों की भारी कमी होने की आशंका है। अफगानिस्तान जैसे रूढ़िवादी समाज में महिलाओं के इलाज के लिए महिला डॉक्टरों और नर्सों का होना अनिवार्य है। ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में आने वाली पीढ़ी कुपोषण और बीमारियों की चपेट में आकर कमजोर हो जाएगी, जिससे शिशु और मातृ मृत्यु दर में भी भारी इजाफा हो सकता है।
महिलाओं को काम से रोकने का असर केवल सामाजिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी विनाशकारी साबित हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी खत्म होने से अफगान अर्थव्यवस्था को हर साल करीब 5.3 अरब अफगानी (लगभग 84 मिलियन डॉलर) का सीधा नुकसान हो सकता है। यह राशि अफगानिस्तान की कुल जीडीपी का लगभग 0.5 प्रतिशत है। एक ऐसा देश जो पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और गरीबी से जूझ रहा है, उसके लिए यह आर्थिक चोट असहनीय होगी।
यूनिसेफ ने अपनी रिपोर्ट के निष्कर्ष में स्पष्ट किया है कि अफगानिस्तान को दोबारा खड़ा करने के लिए महिलाओं को काम करने की अनुमति देना और लड़कियों को शिक्षित करना सबसे अनिवार्य शर्त है। किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी आधी आबादी को कौशल प्रशिक्षण और शिक्षा से वंचित रखकर सुरक्षित नहीं किया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी इस दिशा में दबाव बनाना होगा ताकि अफगानिस्तान की वर्तमान सरकार महिलाओं के अधिकारों और उनके भविष्य की सुरक्षा के प्रति जवाबदेह बन सके।
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