Project Ranjit
Project Ranjit: T-72 टैंक विश्व सैन्य इतिहास के सबसे सफल और व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले मुख्य युद्धक टैंकों (Main Battle Tanks) में से एक माना जाता है। इसकी विकास यात्रा 1960 के दशक के अंतिम वर्षों में सोवियत संघ (USSR) में शुरू हुई थी। तकनीकी परीक्षणों के बाद, साल 1971 में इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ और 1973 तक इसे आधिकारिक तौर पर सोवियत सेना के बेड़े में शामिल कर लिया गया। इसकी मजबूती और मारक क्षमता को देखते हुए दुनिया के कई देशों ने इसे अपनी सेना का हिस्सा बनाया, जिनमें भारत प्रमुख था।
सोवियत सेना में शामिल होने के कुछ ही वर्षों के भीतर, भारत ने अपनी सैन्य शक्ति को आधुनिक बनाने के लिए T-72 को चुनने का निर्णय लिया। 1978-79 के दौरान इसे भारतीय सेना में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई। भारत में इस टैंक को एक नया और शक्तिशाली नाम दिया गया— ‘अजेय’। इसकी उपयोगिता इतनी अधिक थी कि बाद में भारत ने चेन्नई के अवाड़ी स्थित भारी वाहन कारखाने (HVF) में इसका लाइसेंस उत्पादन भी शुरू किया। दशकों तक, अजेय टैंक भारतीय बख्तरबंद रेजिमेंट की रीढ़ बना रहा और कई महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों में अपनी काबिलियत साबित की।
आज के समय में युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। अब केवल भारी कवच और तोप ही काफी नहीं हैं। वर्तमान युद्धक्षेत्र में टैंकों के सामने एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM), ड्रोन हमले, स्मार्ट म्यूनिशन और परिष्कृत बारूदी सुरंगों (IED) जैसे गंभीर खतरे मौजूद हैं। हालांकि T-72 के अपग्रेडेड वर्जन आज भी सेवा दे रहे हैं, लेकिन उनकी तकनीकी सीमाएं अब भविष्य की चुनौतियों के सामने कम पड़ने लगी हैं। यही कारण है कि भारतीय रक्षा मंत्रालय ने अब पुराने होते इन टैंकों को चरणबद्ध तरीके से हटाकर पूरी तरह स्वदेशी और आधुनिक टैंकों को लाने की योजना बनाई है।
भारतीय सेना की भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए ‘प्रोजेक्ट रणजीत’ की शुरुआत की गई है। इस प्रोजेक्ट के तहत विकसित होने वाले टैंक महज मशीनी वाहन नहीं, बल्कि चलते-फिरते हाई-टेक कंप्यूटर होंगे। इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम लगाया जाएगा, जो युद्ध के मैदान में पलक झपकते ही दुश्मन की पहचान कर सकेगा। ये टैंक नेटवर्क-केंद्रित युद्ध प्रणाली से लैस होंगे, जिससे कमांडर को रियल-टाइम डेटा मिलता रहेगा। यह तकनीक भारतीय सेना को डिजिटल युग के युद्ध के लिए तैयार करेगी।
प्रोजेक्ट रणजीत के टैंकों की सबसे बड़ी खासियत उनका एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (APS) होगा। यह सिस्टम किसी भी आने वाली मिसाइल या रॉकेट को टैंक से टकराने से पहले ही हवा में नष्ट करने में सक्षम होगा। इसके अलावा, आधुनिक युद्ध में ड्रोन्स की बढ़ती भूमिका को देखते हुए, इन टैंकों में ‘ड्रोन इंटीग्रेशन’ की सुविधा दी जाएगी। इसका मतलब है कि टैंक के अंदर बैठा ऑपरेटर अपने खुद के ड्रोन लॉन्च कर सकेगा, जो टोही गतिविधियों और सटीक हमलों में मदद करेंगे। बेहतर फायरपावर और उच्च स्तर की सुरक्षा इन टैंकों को दुनिया के बेहतरीन टैंकों की श्रेणी में खड़ा करेगी।
प्रोजेक्ट रणजीत केवल सैन्य मजबूती का माध्यम नहीं है, बल्कि यह भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता का एक बड़ा प्रतीक भी है। इन टैंकों का विकास और निर्माण स्वदेशी स्तर पर होने से विदेशी निर्भरता कम होगी और घरेलू रक्षा उद्योग को प्रोत्साहन मिलेगा। जब ये अत्याधुनिक टैंक भारतीय सेना के बेड़े में शामिल होंगे, तो सीमावर्ती इलाकों, विशेषकर दुर्गम मैदानी और रेगिस्तानी क्षेत्रों में भारत की रक्षा दीवार पहले से कहीं अधिक मजबूत हो जाएगी। यह प्रोजेक्ट भविष्य के युद्धों के लिए भारत की तैयारी को एक नई दिशा प्रदान करेगा।
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