UP Politics
UP Politics: उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में इन दिनों वैचारिक और व्यक्तिगत हमलों का दौर तेज हो गया है। समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की धार्मिक और प्रशासनिक पहचान पर सीधा प्रहार किया है। अखिलेश ने न केवल योगी की कार्यशैली पर सवाल उठाए, बल्कि उनके ‘योगी’ होने की पात्रता को लेकर भी गंभीर टिप्पणी की है। इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें अब धर्म, परंपरा और राजनीतिक विचारधाराएं आमने-सामने आ गई हैं। अखिलेश के इस तीखे तेवर ने आगामी चुनावी संभावनाओं के बीच ध्रुवीकरण की नई लकीर खींच दी है।
उन्नाव में एक जनसभा को संबोधित करते हुए अखिलेश यादव ने भगवा वस्त्र और हिंदू परंपराओं का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में भगवा त्याग और तपस्या का प्रतीक है, लेकिन केवल चोला ओढ़ लेने या कान छिदवा लेने मात्र से कोई व्यक्ति योगी नहीं बन जाता। श्रीमद्भगवद्गीता और गुरु नानक देव जी के दर्शन का उदाहरण देते हुए अखिलेश ने तर्क दिया कि एक सच्चा योगी वह है जिसने समस्त सांसारिक मोह-माया और इच्छाओं का त्याग कर दिया हो। उन्होंने तंज कसा कि सत्ता का मोह रखने वाला व्यक्ति खुद को योगी कैसे कह सकता है?
अखिलेश यादव ने प्रयागराज माघ मेले की घटना का उल्लेख करते हुए सरकार को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस प्रदेश में पूजनीय शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को संगम में गंगा स्नान करने से पुलिस के जरिए रोका जाए, वह सरकार अधर्म के मार्ग पर चल रही है। अखिलेश ने इसे सनातन परंपरा का घोर अपमान बताते हुए कहा कि संतों का अपमान करने वाली सरकार पाप की भागी है। विपक्ष का तर्क है कि प्रशासन ने न केवल शंकराचार्य को रोका, बल्कि उनकी पदवी पर सवाल उठाकर हिंदू समाज की आस्था को चोट पहुंचाई है।
सपा अध्यक्ष की टिप्पणियों ने संत समाज को आक्रोशित कर दिया है। अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने अखिलेश यादव को भाषाई मर्यादा बनाए रखने की कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि योगी आदित्यनाथ को अखिलेश यादव से किसी ‘सर्टिफिकेट’ की जरूरत नहीं है। समिति ने कहा कि योगी जी गोरक्षपीठ की तीन पीढ़ियों की साधना और तपस्या के उत्तराधिकारी हैं। संतों ने अखिलेश पर पलटवार करते हुए कहा कि वे केवल अपने पिता की राजनीतिक विरासत को भुना रहे हैं, जबकि योगी जी ने अपने जीवन को जनसेवा और धर्म के लिए समर्पित किया है।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब प्रशासन ने शंकराचार्य पद की प्रमाणिकता को लेकर नोटिस जारी किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा के पटल पर स्पष्ट किया था कि धार्मिक उपाधियों के उपयोग के लिए पात्रता और मर्यादाओं का पालन अनिवार्य है। सरकार का रुख है कि वह धर्म के नाम पर किसी भी प्रकार की अव्यवस्था या नियमों के उल्लंघन को बर्दाश्त नहीं करेगी। फिलहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में आस्था और सत्ता के इस टकराव ने माहौल को पूरी तरह गरमा दिया है, जहां एक पक्ष इसे परंपरा का अपमान बता रहा है तो दूसरा पक्ष इसे नियमों की बहाली।
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