Women Reservation Bill
Women Reservation Bill : शतरंज हो या राजनीति, हर चाल बहुत संभलकर चलनी पड़ती है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले अमित शाह हैं, तो दूसरी ओर अखिलेश यादव, जिन्होंने 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में शानदार प्रदर्शन कर यह साबित कर दिया कि वे अब राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं रहे। पिछले चुनाव में इंडिया गठबंधन ने ‘संविधान बचाओ’ और ‘आरक्षण’ के नैरेटिव से बढ़त बनाई थी, लेकिन राजनीति में एक ही दांव बार-बार काम नहीं आता। अब अमित शाह ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के जरिए नया दांव खेला, जिससे विपक्षी खेमे में हलचल मच गई है।
हाल ही में सदन में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 पर मतदान हुआ। इस बिल का उद्देश्य महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देना था। मतदान के दौरान बिल के पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े। हालांकि, संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत न मिल पाने के कारण यह ऐतिहासिक बिल गिर गया। इसके साथ ही सरकार ने परिसीमन विधेयक और संघ राज्य विधि संशोधन विधेयक को भी आगे नहीं बढ़ाया। अब चर्चा इस बात की है कि क्या सरकार संयुक्त सत्र बुलाएगी, हालांकि इस पर अभी संशय बना हुआ है।
महिला आरक्षण बिल के विरोध में अखिलेश यादव अपने पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव की ही राह पर चल रहे हैं। समाजवादी पार्टी हमेशा से महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग से कोटे की मांग करती रही है। इस बिल का इतिहास काफी हिंसक रहा है; 1996 में देवगौड़ा सरकार से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार तक, सदन में इस मुद्दे पर कई बार तीखी झड़पें और धक्का-मुक्की हुई। अखिलेश का तर्क है कि वे बिल के विरोधी नहीं हैं, बल्कि इसमें ‘आरक्षण के अंदर आरक्षण’ न होने और सरकार की कथित ‘जल्दबाजी’ के पीछे की साजिश के खिलाफ हैं।
सदन में चर्चा के दौरान जब अखिलेश ने ओबीसी आरक्षण और जाति जनगणना का मुद्दा उठाया, तो अमित शाह ने कड़ा रुख अपनाया। शाह ने स्पष्ट किया कि संविधान में धर्म के आधार पर मुस्लिमों के लिए आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। जाति जनगणना पर सवाल का जवाब देते हुए शाह ने कहा कि आगामी जनगणना में जाति का कॉलम शामिल रहेगा। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि “आदमी की जाति होती है, घर की नहीं”, इसलिए पहले घरों की गणना हो रही है और फिर व्यक्तियों की होगी।
अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ी चुनौती योगी सरकार का कानून-व्यवस्था का रिकॉर्ड है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि 2016 के मुकाबले 2023 में उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में भारी कमी आई है। हत्याएं 4889 से घटकर 3307 रह गईं, जबकि बलात्कार और एसिड अटैक की घटनाओं में भी गिरावट दर्ज की गई है। योगी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति और एंटी-रोमियो स्क्वॉड जैसे कदमों ने महिला वोटरों के बीच एक सुरक्षित माहौल का अहसास कराया है, जिसका मुकाबला करना सपा के लिए कठिन चुनौती है।
अखिलेश यादव फिलहाल एक ऐसी दोधारी तलवार पर चल रहे हैं जहाँ एक तरफ उनका ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) वोट बैंक है और दूसरी तरफ महिला सशक्तिकरण का मुद्दा। बिल का विरोध करके उन्होंने अपने कोर वोटरों को तो साध लिया है, लेकिन बीजेपी इसे “महिला विरोधी” मानसिकता बताकर 2027 के चुनाव में हथियार बना सकती है। मुलायम सिंह के पुराने विवादित बयानों की गूँज आज भी जनता के कानों में है। अब यह वक्त ही बताएगा कि अखिलेश की यह रणनीतिक चाल उन्हें जीत दिलाएगी या राजनीतिक जोखिम में डाल देगी।
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