Al Aqsa Mosque Closure
Al Aqsa Mosque Closure: मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) में जारी भीषण संघर्ष और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से जुड़ी विभिन्न अफवाहों के बीच इजरायल ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसने मुस्लिम जगत में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। रमजान का पवित्र महीना अपने अंतिम पड़ाव पर है और ईद का चांद दिखने ही वाला है, लेकिन यरुशलम स्थित ऐतिहासिक अल अक्सा मस्जिद पिछले 16 दिनों से श्रद्धालुओं के लिए बंद है। इस फैसले ने न केवल फिलिस्तीनी नागरिकों बल्कि अरब के तमाम मुस्लिम देशों को नाराज कर दिया है। अरब लीग ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इजरायल की सार्वजनिक रूप से निंदा की है और इसे धार्मिक स्वतंत्रता का हनन बताया है।
दुनिया की तीसरी सबसे पवित्र मस्जिद मानी जाने वाली अल अक्सा के बंद होने पर अरब लीग ने कड़ा रुख अपनाया है। उनका तर्क है कि रमजान और ईद जैसे महत्वपूर्ण समय पर मुसलमानों को इबादत से रोकना पूरी तरह से अनुचित है। अरब लीग के अनुसार, इजरायल के पास किसी भी समुदाय को उनके पवित्र स्थल पर जाने से रोकने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इस कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का स्पष्ट उल्लंघन करार देते हुए अरब देशों ने वैश्विक समुदाय से हस्तक्षेप की अपील की है। लीग का मानना है कि ऐसे फैसलों से न केवल क्षेत्रीय शांति भंग होगी, बल्कि वैश्विक सुरक्षा पर भी इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
रिकॉर्ड बताते हैं कि 1967 में पूर्वी यरुशलम पर इजरायल के कब्जे के बाद यह पहली बार है जब रमजान के दौरान इतने लंबे समय तक मस्जिद को बंद रखा गया है। 28 फरवरी से ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच छिड़ी जंग के बाद से सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए मस्जिद के द्वार बंद हैं। केवल अल अक्सा ही नहीं, बल्कि वेस्ट बैंक की इब्राहिमी मस्जिद में भी नमाजियों की संख्या को बेहद सीमित (मात्र 50 लोग) कर दिया गया है। इसके कारण हजारों फिलिस्तीनी मुसलमानों को सड़कों और दीवारों के सहारे नमाज अदा करने पर मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे रमजान की विशेष इबादतें जैसे ‘इतिकाफ’ बुरी तरह प्रभावित हुई हैं।
इस विवादित फैसले के पीछे इजरायल सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था का तर्क दिया है। इजरायली प्रशासन का कहना है कि ईरान की ओर से होने वाले मिसाइल हमलों और संभावित जान-माल के नुकसान को रोकने के लिए मस्जिद को बंद करना एक अनिवार्य कदम था। उनके मुताबिक, युद्ध की स्थिति में भीड़भाड़ वाले धार्मिक स्थलों पर नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता है। हालांकि, मुस्लिम देशों ने इस तर्क को खारिज करते हुए इसे एक बहाना बताया है और कहा है कि सुरक्षा के नाम पर इबादत की आजादी नहीं छीनी जा सकती।
इजरायल के इस कदम के खिलाफ केवल अरब लीग ही नहीं, बल्कि कतर, जॉर्डन, इंडोनेशिया, तुर्की, पाकिस्तान, सऊदी अरब, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात जैसे आठ प्रमुख इस्लामी देशों ने भी मोर्चा खोल दिया है। इसके अलावा, ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन (OIC) और मुस्लिम वर्ल्ड लीग जैसी संस्थाओं ने भी इस बंदी को ‘धार्मिक अधिकारों पर हमला’ करार दिया है। अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है कि यरुशलम के पवित्र स्थलों की स्थिति को पूर्ववत किया जाए ताकि मुस्लिम समुदाय शांतिपूर्वक अपनी ईद मना सके।
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