Women Reservation Bill
Women Reservation Bill : संसद के विशेष सत्र में उस समय एक ऐतिहासिक गतिरोध पैदा हो गया, जब बहुप्रतीक्षित महिला आरक्षण बिल (131वां संविधान संशोधन विधेयक) लोकसभा में पारित नहीं हो सका। शुक्रवार, 17 अप्रैल को 21 घंटे की मैराथन चर्चा के बाद जब वोटिंग हुई, तो सदन में मौजूद 528 सांसदों में से केवल 298 ने इसके पक्ष में मतदान किया, जबकि 230 वोट विरोध में पड़े। किसी भी संविधान संशोधन को पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जो इस मामले में 352 था। इस प्रकार, यह महत्वपूर्ण विधेयक 54 वोटों के अंतर से गिर गया। इस बिल में न केवल महिलाओं को 33% आरक्षण देने, बल्कि लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का भी प्रावधान था।
विधेयक गिरने के बाद विपक्षी खेमे में जीत का माहौल और जश्न देख केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर विपक्षी दलों पर तीखा प्रहार करते हुए कहा, “देश की आधी आबादी और लगभग 70 करोड़ महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करने के बाद कोई विजय का जश्न कैसे मना सकता है?” शाह ने इसे महिलाओं के विश्वास के साथ किया गया एक बड़ा धोखा करार दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि विपक्ष का यह अहंकार उनकी असलियत में छिपी हुई एक बड़ी नैतिक पराजय है, जिसे वे अपनी संकीर्ण राजनीति के कारण देख नहीं पा रहे हैं।
अमित शाह ने अपने बयान में विशेष रूप से कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि लोकसभा में जो दृश्य दिखा, वह अकल्पनीय और निंदनीय था। शाह के अनुसार, “महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाले विधेयक को खारिज करना और फिर उस पर जीत के नारे लगाना हर उस महिला का अपमान है, जो दशकों से प्रतिनिधित्व का इंतजार कर रही है।” उन्होंने सवाल उठाया कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल आखिर कितनी बार महिलाओं के साथ विश्वासघात करेंगे? शाह ने आरोप लगाया कि इन दलों की मानसिकता न तो महिलाओं के कल्याण के पक्ष में है और न ही राष्ट्रहित में।
गृह मंत्री ने विपक्ष को आगाह करते हुए कहा कि नारी शक्ति के अपमान की यह गूँज बहुत दूर तक जाएगी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विपक्ष को इस “ऐतिहासिक भूल” का खामियाजा भुगतना होगा। शाह ने कहा, “विपक्ष को न केवल 2029 के लोकसभा चुनावों में, बल्कि हर स्तर के चुनाव में महिलाओं के भारी प्रकोप का सामना करना पड़ेगा।” उनके अनुसार, इस बिल को रोककर विपक्ष ने साबित कर दिया है कि वे महिलाओं को केवल वोट बैंक समझते हैं, उन्हें राजनीतिक अधिकार देने के पक्षधर नहीं हैं।
संसद में इस बिल के गिरने के साथ ही भारत की राजनीति में महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर ध्रुवीकरण का केंद्र बन गया है। जहाँ सत्ता पक्ष इसे विपक्ष की ‘महिला विरोधी’ सोच बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे अपनी रणनीतिक जीत मान रहा है। हालांकि, इस राजनीतिक खींचतान के बीच सबसे बड़ा नुकसान उन करोड़ों महिलाओं का हुआ है, जिनकी उम्मीदें इस कानून से जुड़ी थीं। 54 वोटों की यह कमी भारतीय संसदीय इतिहास में एक लंबी बहस का विषय बनी रहेगी और आने वाले विधानसभा चुनावों में यह एक मुख्य चुनावी मुद्दा बनकर उभरेगा।
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