Arctic Cloud Factory : आर्कटिक में मिली प्राकृतिक क्लाउड फैक्ट्री, एक दिन में 50 गुना बढ़े बादल बनाने वाले कण

आर्कटिक में वैज्ञानिकों ने बादल बनाने वाले कणों की एक प्राकृतिक प्रक्रिया खोजी है। समुद्री बर्फ और खुले समुद्र की सीमा पर सूर्य की रोशनी, आयोडीन, सल्फर और जैविक यौगिक मिलकर नए कण बनाते हैं। शोधकर्ताओं ने एक दिन में इन कणों की संख्या 50 गुना तक बढ़ते देखी, जिससे जलवायु मॉडल प्रभावित हो सकते हैं।

Arctic Cloud Factory :  ग्लोबल वार्मिंग और तेजी से पिघलती बर्फ के बीच वैज्ञानिकों को आर्कटिक क्षेत्र में एक ऐसी प्राकृतिक प्रक्रिया का पता चला है, जो जलवायु विज्ञान के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। शोधकर्ताओं ने पाया कि उत्तरी ध्रुव के आसपास वातावरण में मौजूद बादल बनाने वाले सूक्ष्म कणों की संख्या केवल 24 घंटे में करीब 50 गुना तक बढ़ सकती है। सबसे अहम बात यह है कि जलवायु और भविष्य के मौसम का अनुमान लगाने वाले मौजूदा मॉडल्स में इस प्रक्रिया को अब तक पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया था।

ads
Adst

समुद्र और बर्फ के बीच बन रही प्राकृतिक क्लाउड फैक्ट्री

इस अध्ययन का नेतृत्व यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम के वैज्ञानिकों ने चीन और स्पेन के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर किया। शोधकर्ताओं ने वर्ष 2022 में ग्रीनलैंड और डेविस स्ट्रेट के आसपास अनुसंधान जहाज RRS Discovery से डेटा एकत्र किया। अध्ययन का केंद्र वह क्षेत्र था जहां समुद्री बर्फ खुले पानी से मिलती है। इसे मार्जिनल आइस जोन कहा जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यहीं समुद्र, बर्फ, सूर्य की रोशनी और विभिन्न प्राकृतिक रसायनों के बीच महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया होती है।

Adst

आयोडीन और समुद्री शैवाल निभाते हैं अहम भूमिका

शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि समुद्र और बर्फ से निकलने वाला आयोडीन, समुद्री शैवाल से निकलने वाला डाइमिथाइलसल्फाइड यानी DMS और समुद्र तथा जमीन से निकलने वाले प्राकृतिक ऑर्गेनिक कंपाउंड्स आपस में प्रतिक्रिया करते हैं। जब इन रसायनों पर सूर्य की तेज रोशनी पड़ती है, तो वातावरण में नए बेहद छोटे कण बनने लगते हैं। यही कण आगे चलकर बादलों की बूंदों के लिए आधार यानी क्लाउड सीड का काम कर सकते हैं।

एक दिन में 50 से बढ़कर 1500 कण

वैज्ञानिकों के अवलोकन में इस प्रक्रिया का प्रभाव बेहद तेजी से दिखाई दिया। क्षेत्र में बादल बनाने वाले कणों की संख्या करीब 50 प्रति घन सेंटीमीटर से बढ़कर केवल एक दिन में लगभग 1,500 प्रति घन सेंटीमीटर तक पहुंच गई। यानी 24 घंटे के अंदर इन कणों की मात्रा करीब 50 गुना बढ़ गई। यह बदलाव आर्कटिक के वातावरण और वहां बनने वाले बादलों को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पहली बार खुले वातावरण में मिला सबूत

इस तरह की रासायनिक प्रक्रिया को पहले स्विट्जरलैंड स्थित CERN की CLOUD चैंबर प्रयोगशाला में नियंत्रित परिस्थितियों के दौरान देखा गया था। हालांकि नए अध्ययन में पहली बार खुले वातावरण में इसके प्रमाण मिले हैं। वैज्ञानिकों ने हवा में आयोडीन युक्त ऑक्सीजनयुक्त ऑर्गेनिक अणुओं यानी I-OOMs की पहचान की। ये अणु छोटे कणों को बड़ा करने में मदद कर सकते हैं, जिससे वे बादलों के निर्माण में प्रभावी भूमिका निभाने लगते हैं।

Adst

धूप वाले ज्यादातर दिनों में सक्रिय रही प्रक्रिया

अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार यह प्रक्रिया कोई दुर्लभ घटना नहीं है। शोधकर्ताओं ने देखा कि आर्कटिक में 80 प्रतिशत से अधिक धूप वाले दिनों में यह रासायनिक गतिविधि लगातार देखी गई। इससे संकेत मिलता है कि प्राकृतिक क्लाउड फैक्ट्री आर्कटिक वातावरण में नियमित रूप से सक्रिय हो सकती है। यह खोज आयोडीन आधारित वायुमंडलीय रसायन विज्ञान को समझने के लिए भी नई दिशा देती है।

बढ़ती गर्मी के साथ बढ़ सकता है प्रभाव

आर्कटिक पिछले कई दशकों में दुनिया के औसत तापमान की तुलना में तेजी से गर्म हुआ है। तापमान बढ़ने के साथ समुद्री बर्फ पीछे हट रही है और मार्जिनल आइस जोन का क्षेत्र बढ़ रहा है। इसका मतलब यह हो सकता है कि भविष्य में इस प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रिया के लिए परिस्थितियां और अनुकूल हो सकती हैं। हालांकि इसका जलवायु पर अंतिम प्रभाव अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

ज्यादा बादल राहत देंगे या बढ़ाएंगे गर्मी?

वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि बढ़ते बादलों का आर्कटिक पर वास्तविक असर क्या होगा। गर्मियों में घने बादल सूर्य की किरणों को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित करके समुद्र की सतह को ठंडा रखने में मदद कर सकते हैं। लेकिन दूसरी ओर बादल धरती से निकलने वाली गर्मी को रोककर सतह के तापमान को बढ़ा सकते हैं, जिससे बर्फ पिघलने की गति प्रभावित हो सकती है।

क्लाइमेट मॉडल्स में शामिल होगी नई प्रक्रिया

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस नई खोज को भविष्य के वैश्विक जलवायु मॉडल्स में शामिल करना जरूरी होगा। इससे वैज्ञानिक बेहतर तरीके से समझ सकेंगे कि आर्कटिक की बदलती परिस्थितियां बादलों, तापमान और बर्फ के पिघलने को किस तरह प्रभावित करती हैं। साथ ही यह जानकारी भविष्य में वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अधिक सटीक अनुमान लगाने में भी मदद कर सकती है।

Read More  :  PM Modi Space Startup Meet: सैटेलाइट से AI तक, भारत को ग्लोबल स्पेस हब बनाने का बड़ा प्लान

Adst
Chandan Das

Chandan Das

Writer & Blogger

All Posts
पिछले पोस्ट
अगला पोस्ट

ताज़ा खबरे

  • All Posts
  • FIFA World Cup 2026
  • Thetarget365
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अन्य
  • अपराध
  • कारोबार
  • कृषि
  • खेल
  • छत्तीसगढ़
  • टेक
  • ट्रेंड
  • ताज़ा खबर
  • धर्म
  • पशु-पक्षी
  • मनोरंजन
  • मौसम
  • राजनीति
  • राष्ट्रीय
  • विचार/लेख
  • शिक्षा और नौकरी
  • साहित्य/मीडिया
  • सेहत-फिटनेस

© 2026 | All Rights Reserved | Thetarget365.com | Made By Top News Portal Development Company

Contacts

Call Us At – +91-:9406130006
WhatsApp – +91 62665 68872
Mail Us At – thetargetweb@gmail.com
Meet Us At – Shitla Ward, Ambikapur Dist. Surguja Chhattisgarh.497001.

Adst