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Bangladesh Hindu Murder: बांग्लादेश में दीपू की बर्बर हत्या के बाद विधवा पत्नी का दर्द, “अब हमारी मासूम बच्ची का क्या होगा?”

Bangladesh Hindu Murder: पड़ोसी देश बांग्लादेश में कट्टरपंथ और अंधे गुस्से की आग ने एक और मासूम ज़िंदगी को निगल लिया है। मैमनसिंह जिले के मोकामियाकांडा गांव का रहने वाला 30 वर्षीय दीपू चंद्र दास, जो अपने परिवार का इकलौता सहारा था, अब इस दुनिया में नहीं है। एक साधारण फैक्ट्री वर्कर की इस नृशंस हत्या ने न केवल बांग्लादेश को दहला दिया है, बल्कि इसकी गूंज अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई दे रही है। पद्मा नदी के किनारे बसे एक अल्पसंख्यक हिंदू युवक का लहू अब न्याय की मांग कर रहा है।

Bangladesh Hindu Murder: कट्टरपंथ की भेंट चढ़ी एक बेगुनाह की ज़िंदगी

यह दुखद घटना 18 दिसंबर को तब शुरू हुई जब बांग्लादेश में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के विरोधी नेता और ‘इंकलाब मंच’ के प्रवक्ता उस्मान हादी की गोली लगने से मौत हो गई। इस खबर के फैलते ही देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव और धार्मिक अशांति फैल गई। इस उन्माद का शिकार बना बेगुनाह मजदूर दीपू चंद्र दास। कट्टरपंथियों की भीड़ ने उसे फैक्ट्री के बाहर पकड़ा, बेरहमी से पीटा और फिर उसे जिंदा जलाकर मार डाला। दीपू का कसूर सिर्फ इतना था कि वह उस समय वहां मौजूद था और एक अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखता था।

Bangladesh Hindu Murder: विधवा पत्नी का दर्द: “अब हमारी मासूम बच्ची का क्या होगा?”

दीपू की पत्नी, 21 वर्षीय मेघना रानी की दुनिया अब पूरी तरह उजड़ चुकी है। अपनी डेढ़ साल की मासूम बेटी को गोद में लिए मेघना के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। मंगलवार को जब दीपू का अंतिम संस्कार हो रहा था, तब मेघना ने रूंधे गले से पूछा, “मेरे पति इस नन्ही सी बच्ची को किसके सहारे छोड़ गए हैं? अब हमारा क्या होगा?” प्रशासन ने मेघना को नौकरी देने का आश्वासन तो दिया है, लेकिन क्या एक सरकारी नौकरी उस गहरे जख्म को भर पाएगी जो नफरत की आग ने इस परिवार को दिया है?

आखिरी बातचीत: सामान्य था सब कुछ, फिर हुआ तांडव

परिवार के अनुसार, दीपू 15 दिसंबर को अपने गांव घर आया था और 17 दिसंबर को वापस काम पर लौटा था। घटना वाले दिन यानी 18 दिसंबर की शाम 5 बजे दीपू ने अपनी पत्नी से फोन पर बात की थी। मेघना ने बताया कि वह फोन पर अपनी बेटी की बातें पूछ रहा था और घर की खैरियत ले रहा था। उसने एक बार भी नहीं कहा कि फैक्ट्री में कोई तनाव है या उसे अपनी जान का खतरा है। लेकिन इस बातचीत के कुछ ही घंटों बाद, बिना किसी जुर्म के उसे मौत के घाट उतार दिया गया।

बूढ़े पिता के कंधों पर जवान बेटे की अर्थी का बोझ

दीपू के पिता, रवि चंद्र दास भी एक दिहाड़ी मजदूर हैं। अपने बड़े बेटे को खोने का गम उनके चेहरे पर साफ झलकता है। उन्होंने बताया कि दीपू पढ़ाई में होनहार था, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उसने डिग्री के दूसरे साल के बाद पढ़ाई छोड़ दी और गारमेंट फैक्ट्री में काम करने लगा। रवि चंद्र दास कहते हैं, “वही मेरे पूरे परिवार का पेट भरता था, उसी के भरोसे घर चलता था। लेकिन बेरहम लोगों ने मेरे बेटे को खत्म कर दिया।” एक पिता के लिए अपने जवान बेटे की अर्थी को कंधा देना सबसे बड़ा दुख है।

इंटरनेशनल मुद्दा बनी दीपू की हत्या और सुलगता विरोध

दीपू चंद्र दास की हत्या अब केवल एक स्थानीय अपराध नहीं रह गई है। पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली और काठमांडू तक, इस घटना के खिलाफ कड़ा विरोध प्रदर्शन देखा जा रहा है। मानवाधिकार संगठनों और हिंदू समूहों ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। हालांकि स्थानीय प्रशासन परिवार के साथ खड़ा होने का दावा कर रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ बढ़ते इस कट्टरपंथ पर लगाम लग पाएगी या दीपू जैसे और बेगुनाह इस आग में झोंके जाते रहेंगे?

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