Bangladesh Political Crisis
Bangladesh Political Crisis: बांग्लादेश की राजनीति दशकों से दो शक्तिशाली ध्रुवों—शेख हसीना (अवामी लीग) और खालिदा जिया (बीएनपी)—के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन 30 दिसंबर 2025 तक आते-आते यह परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। जुलाई-अगस्त 2024 के छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा, वहीं दूसरी ओर बीएनपी की कद्दावर नेता खालिदा जिया का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। इन दोनों कद्दावर नेताओं की अनुपस्थिति ने बांग्लादेशी राजनीति में एक ऐसा ‘पावर वैक्यूम’ (शक्ति शून्य) पैदा कर दिया है, जिसे लेकर पूरी दुनिया चिंतित है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस खालीपन को कट्टरपंथी ताकतें भरेंगी?
पूर्व गृह मंत्री और अवामी लीग के वरिष्ठ नेता असदुज्जमां कमाल खान का मानना है कि यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है। उनके अनुसार, यह एक पुरानी ‘माइनस टू’ साज़िश का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य शेख हसीना और खालिदा जिया दोनों को राजनीति से हटाना था। खान का सीधा आरोप है कि इस साज़िश के पीछे वर्तमान अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस का हाथ है। उन्होंने कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि जिस ‘जमात-ए-इस्लामी’ ने 1971 के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानियों का साथ दिया और बुद्धिजीवियों का कत्लेआम किया, आज वही जमात यूनुस सरकार की आड़ में देश का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में ले चुकी है। उनके अनुसार, पाकिस्तान अब जमात के जरिए बांग्लादेश को नियंत्रित कर रहा है।
अवामी लीग के दावों के विपरीत, बीएनपी नेता और पूर्व सांसद शमसुज्जमां डुडू एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। वे इस बात को सिरे से खारिज करते हैं कि चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी सत्ता पर काबिज हो रही है। डुडू का तर्क है कि भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में धर्म आधारित राजनीति को कभी भी दीर्घकालिक जनसमर्थन नहीं मिला है। वे मानते हैं कि बांग्लादेश की जनता लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की पक्षधर है। उनके अनुसार, वर्तमान उथल-पुथल एक संक्रमण काल है और चुनाव के बाद स्थिति स्पष्ट होगी। वे बांग्लादेश के भविष्य को उज्ज्वल देखते हैं और किसी भी कट्टरपंथी खतरे को नकारते हैं।
बांग्लादेश के प्रसिद्ध विचारक और लेखक बाकि बिल्लाह इस संकट के लिए अवामी लीग और बीएनपी दोनों को समान रूप से जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि हसीना और खालिदा ने सत्ता के संघर्ष में हमेशा चरमपंथी समूहों का इस्तेमाल किया। बिल्लाह के अनुसार, शेख हसीना के तानाशाही शासन ने बीएनपी जैसी लोकतांत्रिक विपक्ष को कुचलने की कोशिश की, जिससे कट्टरपंथी समूहों को पनपने के लिए खाद-पानी मिला। वे कहते हैं कि अगर दोनों पार्टियां शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण का सिस्टम बना पातीं, तो आज यह अराजकता नहीं होती। दुखद यह है कि वर्तमान में देश में ऐसी कोई नई धर्मनिरपेक्ष (Secular) ताकत नहीं बची है, जिस पर लोग भरोसा कर सकें।
विश्लेषकों और लेखकों, जैसे चौधरी सलाहुद्दीन महमूद का मानना है कि भले ही जमात औपचारिक रूप से सत्ता में न दिखे, लेकिन वह सत्ता के ‘इनर सर्कल’ में सबसे मजबूत है। 5 अगस्त 2024 के बाद से बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावनाएं और पाकिस्तान के प्रति प्रेम अचानक बढ़ गया है। अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं पर हमले, प्रशासनिक पदों से उनका निष्कासन और प्रोग्रेसिव शिक्षकों को जबरन रिटायर करना इसी कट्टरपंथी सोच का परिणाम है। यहाँ तक कि बांग्लादेश की सांस्कृतिक पहचान, जैसे रवींद्र संगीत, राष्ट्रगान ‘आमार सोनार बांग्ला’ और महान फिल्मकार ऋत्विक घटक की विरासत पर भी हमले हो रहे हैं। मुक्ति संग्राम के नायकों को विलेन और बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान को विवादित बनाने की कोशिशें जारी हैं।
पद्मा पार के एक वरिष्ठ पत्रकार, जिन्हें वर्तमान में ‘OSD’ बनाकर उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है, इस स्थिति की कड़वी सच्चाई बयां करते हैं। उनका कहना है कि आज के ‘नए बांग्लादेश’ में प्रोग्रेसिव सोच और मुक्ति संग्राम का समर्थन करना अपराध बन गया है। उनके अनुसार, यह वैक्यूम आज नहीं बल्कि एक दशक पहले तब शुरू हुआ था, जब राजनीतिक संवाद पूरी तरह खत्म हो गया और हिंसा ने जगह ले ली। उनके शब्दों में, “अवामी लीग बिखर चुकी है और बीएनपी की प्रासंगिकता खत्म हो रही है; आज सब कुछ कट्टरपंथियों के इशारे पर हो रहा है।”
बांग्लादेश आज एक चौराहे पर खड़ा है। जहाँ एक ओर लोकतांत्रिक ताकतों के कमजोर होने से कट्टरपंथ के पैर पसारने का डर है, वहीं दूसरी ओर जनता की लोकतंत्र के प्रति अटूट आस्था एक उम्मीद की किरण जगाती है। यदि जल्द ही निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए और एक समावेशी सरकार नहीं बनी, तो बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष पहचान हमेशा के लिए खो सकती है।
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