Bappi Lahiri Records
Bappi Lahiri Records: भारतीय संगीत जगत में जब भी ‘डिस्को’ शब्द का जिक्र होता है, तो मानस पटल पर एक ऐसी छवि उभरती है जो सुनहरी जंजीरों से लदी हो, आँखों पर काला चश्मा हो और चेहरे पर एक मासूम मुस्कान। यह छवि किसी और की नहीं, बल्कि हम सबके चहेते बप्पी दा यानी बप्पी लहरी की है। उन्होंने न केवल भारतीय सिनेमा को रॉक और डिस्को के फ्यूजन से परिचित कराया, बल्कि अपनी अनूठी शैली से खुद को एक ‘आइकन’ के रूप में स्थापित किया। बप्पी लहरी का संगीत आज भी हर पीढ़ी को थिरकने पर मजबूर कर देता है।
बप्पी लहरी ने अपने फिल्मी सफर का आगाज साल 1973 में फिल्म ‘नन्हा शिकारी’ से बतौर संगीत निर्देशक किया था। हालांकि, उन्हें घर-घर में पहचान 1975 की सुपरहिट फिल्म ‘जख्मी’ से मिली। इस फिल्म में उन्होंने न सिर्फ शानदार संगीत दिया, बल्कि पार्श्व गायक (Playback Singer) के रूप में भी अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरा। इसके बाद बप्पी दा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 80 के दशक में उन्होंने पॉप-डिस्को और फास्ट बीट्स का ऐसा दौर शुरू किया कि उन्हें ‘डिस्को किंग’ की उपाधि मिल गई। उनकी धुनें हर पार्टी और जश्न की अनिवार्य हिस्सा बन गईं।
बप्पी लहरी की कार्यक्षमता और संगीत के प्रति उनका जुनून अद्वितीय था। वैसे तो वह अक्सर कहते थे कि एक साल में 2-3 फिल्में करना ही पर्याप्त है, लेकिन काम के प्रति उनकी दीवानगी ने एक अद्भुत इतिहास रच दिया। साल 1986 में उन्होंने एक ही वर्ष के भीतर 33 फिल्मों के लिए 180 से ज्यादा गाने रिकॉर्ड किए। इस असाधारण उपलब्धि के कारण उनका नाम ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में दर्ज किया गया। संगीत जगत में ऐसा कीर्तिमान स्थापित करना उस दौर में नामुमकिन जैसा था, जिसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया।
बप्पी दा का जन्म 27 नवंबर 1952 को पश्चिम बंगाल के एक प्रतिष्ठित संगीत घराने में हुआ था। उनके पिता अपरेश लहरी और माता बंसरी लहरी दोनों ही बंगाल के विख्यात गायक और संगीतकार थे। संगीत उनके रक्त में था, इसीलिए उन्होंने मात्र तीन साल की उम्र से ही संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी। उन्होंने प्रसिद्ध शास्त्रीय तबला वादक पंडित शांताप्रसाद से तबला सीखा और 11 साल की उम्र तक आते-आते वे पियानो और विभिन्न धुनों पर महारत हासिल कर चुके थे। अपने पूरे करियर में उन्होंने हिंदी, बंगाली और दक्षिण भारतीय भाषाओं में 5 हजार से ज्यादा गाने गाए और 500 से अधिक फिल्मों को संगीतबद्ध किया।
बप्पी लहरी का सोने के प्रति लगाव जगजाहिर था। वह भारी-भरकम सोने की चेन और अंगूठियां पहनने के शौकीन थे। इस शौक के पीछे अमेरिकी पॉप स्टार एल्विस प्रेस्ली का प्रभाव था। बप्पी दा ने एक बार साझा किया था कि वे एल्विस प्रेस्ली को सोने की जंजीर पहने देख काफी प्रभावित हुए थे और तभी उन्होंने संकल्प लिया था कि सफल होने पर वे भी खूब सोना पहनेंगे। उनके लिए सोना महज गहना नहीं था, बल्कि वे इसे अपना ‘लकी चार्म’ मानते थे। यहाँ तक कि वे अपने सोने के कप में चाय पीना पसंद करते थे, जो उनके राजसी और अनोखे अंदाज को दर्शाता था।
बप्पी लहरी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी धुनें आज भी उतनी ही ताजा और ऊर्जावान महसूस होती हैं। उन्होंने भारतीय फिल्म संगीत को वह आधुनिकता और गति दी, जिसकी उस समय आवश्यकता थी। ‘आई एम अ डिस्को डांसर’ से लेकर ‘यार बिना चैन कहां रे’ तक, उनके गीतों का जादू सदाबहार है। बप्पी दा का व्यक्तित्व और उनका संगीत हमेशा भारतीय सिनेमा के सुनहरे पन्नों पर अंकित रहेगा।
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