Barghobhima temple : तमलुक की अधिष्ठात्री देवी बरगभीमा पूर्वी मिदनापुर के प्राचीन शहर ताम्रलिप्त (वर्तमान तमलुक) में स्थित मां बर्गभीमा का मंदिर 51 सतीपीठों में से एक है। देवी की पूजा यहां उग्र तारा के रूप में की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के शरीर को खंडित किया था, तो उनका बायां टखना इसी स्थान पर गिरा था।
मंदिर निर्माण की पौराणिक कथा
स्थानीय कथा के अनुसार, राजा गरुड़ध्वज के दरबार में एक मछुआरा प्रतिदिन जीवित मछलियों का झुंड लाता था। एक दिन जब वह मछली नहीं ला सका, तो राजा ने उसे मृत्युदंड देने का आदेश दिया। भयभीत मछुआरा जंगल में भाग गया, जहां देवी भर्गभीमा ने साधारण महिला के रूप में प्रकट होकर उसे एक उपाय बताया—यदि सूखी मछलियों पर विशेष कुएं का पानी छिड़का जाए, तो वे फिर जीवित हो जाएंगी। उपाय सफल रहा और मछुआरा फिर से मछलियां देने लगा।
राजा को जब इसका संदेह हुआ, तो उसने मछुआरे से सच्चाई उगलवा ली और खुद उस चमत्कारी कुएं तक गया। लेकिन देवी, जो मछुआरे के घर में निवास कर रही थीं, नाराज होकर वहां से चली गईं और उस कुएं के पास पत्थर की मूर्ति में समा गईं। बाद में राजा गरुड़ध्वज ने उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया।
मंदिर की विशेषताएं
यह मंदिर ओडिशा शैली की वास्तुकला में निर्मित है और लगभग 60 फीट ऊंचा है। गर्भगृह में देवी की काले पत्थर की मूर्ति स्थित है। यहां देवी की पूजा विभिन्न रूपों में होती है, लेकिन विशेष रूप से काली पूजा के दौरान भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। मंदिर की वास्तविक आयु का अनुमान लगाना कठिन है, लेकिन इसकी धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता निर्विवाद है।
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