Former Naxalites Wedding
Former Naxalites Wedding: छत्तीसगढ़ के नारायणपुर से आज एक ऐसी हृदयस्पर्शी तस्वीर सामने आई है, जो बस्तर के बदलते स्वरूप और माओवाद पर लोकतंत्र की जीत का जीवंत प्रमाण है। कहा जाता है कि प्रेम और विश्वास में वह शक्ति होती है जो हिंसा के सबसे क्रूर रास्ते को भी झुका सकती है। जिन हाथों में कुछ समय पहले तक इंसास राइफल और एके-47 जैसे घातक हथियार हुआ करते थे, आज उन हाथों में विवाह की वरमाला है। जो युवा कभी अबूझमाड़ के दुर्गम जंगलों में बारूद की गंध और मौत के साये के बीच अपनी जिंदगी गुजारते थे, वे आज पवित्र मंत्रोच्चार और ढोल-नगाड़ों के बीच सात फेरे लेकर एक नई शुरुआत कर रहे हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की गरिमामयी उपस्थिति में 4 पूर्व नक्सली जोड़ों ने हमेशा के लिए हिंसा का रास्ता त्याग कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया।
नारायणपुर में आयोजित यह सामूहिक विवाह समारोह मात्र एक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर के जंगलों में शांति की बदलती हवाओं का औपचारिक ऐलान है। कल तक जो साथी एक-दूसरे को ‘लाल सलाम’ के संबोधन से पुकारते थे, वे आज अग्नि को साक्षी मानकर एक-दूसरे के हमसफर बन गए हैं। मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना का भव्य पंडाल इन चार जोड़ों के मिलन का गवाह बना, जिन्होंने नक्सली विचारधारा की खोखली दहशत को पीछे छोड़कर समाज की मुख्यधारा को गले लगाया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने स्वयं इन नवदंपतियों को आशीर्वाद दिया, उन्हें उपहार भेंट किए और उनके सुखी भविष्य की मंगलकामना की। मुख्यमंत्री की उपस्थिति ने इन जोड़ों को यह भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार उनके पुनर्वास और सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
इन चार जोड़ों की मुस्कान के पीछे संघर्ष और खौफ की एक लंबी दास्तान छिपी है। ये वो लोग हैं जो कभी नक्सली संगठन के भीतर ऊंचे पदों पर आसीन थे। इस अनोखे विवाह में सुखलाल, जिसे नक्सलियों के बीच ‘डॉक्टर’ के रूप में जाना जाता था और जो डीवीसीएम (DVCM) रैंक का बड़ा लीडर था, उसने अपनी हमसफर कमला गोटा के साथ फेरे लिए। इसी तरह, रंजीत और कोशी, जो कभी संगठन में पीपीसीएम (PPCM) जैसे पदों पर तैनात थे, अब दांपत्य सूत्र में बंध गए हैं। संगठन में पीसीसीएम (PCCM) रहे मासो मांडवी ने रीता कवासी का हाथ थामा, वहीं एसीएम (ACM) रैंक के पूर्व नक्सली सनी राम ने सुशीला के साथ जीवन भर साथ निभाने की कसमें खाईं।
इन जोड़ों की प्रेम कहानी जंगल की कटीली राहों में शुरू हुई थी। उन्होंने बताया कि संगठन के भीतर बंदूक के साये में न तो प्रेम के लिए कोई जगह थी और न ही परिवार बसाने की अनुमति। वहां हर पल मौत का डर और सुरक्षा बलों का खौफ बना रहता था। जंगल की जिंदगी में न तो सही भोजन नसीब था और न ही कोई सुरक्षित भविष्य। नक्सली विचारधारा ने उनके हाथों में हथियार तो थमा दिए थे, लेकिन उनकी निजी खुशियां और सुकून छीन लिया था। लेकिन जब उन तक छत्तीसगढ़ सरकार की ‘आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति’ की जानकारी पहुँची, तो उन्होंने अंधेरे को छोड़कर उजाले की ओर कदम बढ़ाने का साहसी फैसला किया। आज सरकार की मदद से उनके पास रहने को पक्का मकान है, राशन की सुविधा है और समाज में सिर उठाकर जीने का सम्मान है।
इन पूर्व नक्सलियों का मानना है कि बंदूक की नली से निकली गोली केवल विनाश और दुख लाती है, लेकिन सरकार की सही नीतियां और समाज का अपनापन जीवन में नई खुशियां भर सकता है। नारायणपुर का यह विवाह समारोह अबूझमाड़ के उन भटके हुए युवाओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो आज भी जंगलों में भटक रहे हैं। यह आयोजन साबित करता है कि वापसी के रास्ते कभी बंद नहीं होते और यदि कोई हिंसा का मार्ग छोड़कर लौटता है, तो उसका स्वागत गोलियों से नहीं, बल्कि फूलों, सम्मान और नई जिंदगी के अवसरों के साथ किया जाता है। बस्तर अब बदल रहा है, और यह बदलाव बंदूकों से नहीं, बल्कि प्रेम और विश्वास की डोर से आ रहा है।
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