Bastar Naxalites Holi
Bastar Naxalites Holi: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में इस साल की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि एक नए जीवन के उदय का प्रतीक बनकर आई है। सालों तक घने जंगलों, बारूद की गंध और गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच खौफनाक जिंदगी गुजारने वाले पूर्व नक्सलियों के लिए यह अवसर भावुक कर देने वाला था। हिंसा का रास्ता त्यागकर समाज की मुख्यधारा में शामिल हुए इन युवाओं ने इस बार डर के साये से दूर, खुले आसमान के नीचे अपनी पहली होली मनाई। यह बदलाव बस्तर की बदलती तस्वीर और शांति की ओर बढ़ते कदमों की एक सुखद बानगी पेश करता है।
कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर स्थित ‘मुल्ला चौगेल पुनर्वास केंद्र’ में इस बार का नजारा बिल्कुल अलग था। यहाँ रंग, गुलाल और ढोल की थाप के बीच सरेंडर कर चुके नक्सली अपने साथियों और परिवारों के साथ खुशियां बांटते नजर आए। जो हाथ कभी एके-47 राइफल थामने और आईईडी (IED) बिछाने के लिए जाने जाते थे, उन हाथों में इस बार गुलाल की थैलियां और पिचकारियां थीं। केंद्र के भीतर संगीत की धुनों पर थिरकते इन युवाओं के चेहरों पर वह मुस्कान थी, जो दशकों के संघर्ष के बाद पहली बार दिखाई दी है।
पुनर्वास केंद्र में रहने वाले इन 40 पूर्व नक्सलियों ने न केवल एक-दूसरे को रंग लगाया, बल्कि वहां तैनात पुलिसकर्मियों और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ भी जमकर होली खेली। यह दृश्य सुरक्षा बलों और आत्मसमर्पित कैडरों के बीच बढ़ते विश्वास को दर्शाता है। इस दौरान कई पूर्व नक्सलियों ने जमकर डांस किया और अपनी नई जिंदगी की शुरुआत का जश्न मनाया। अधिकारियों ने भी इन युवाओं को मिठाई खिलाकर और गले लगाकर होली की शुभकामनाएं दीं, जिससे वातावरण पूरी तरह सौहार्दपूर्ण हो गया।
वर्तमान में मुल्ला चौगेल पुनर्वास केंद्र में कुल 40 आत्मसमर्पित नक्सली रह रहे हैं। शासन द्वारा उन्हें केवल रहने की जगह ही नहीं दी गई है, बल्कि उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए विशेष कौशल प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। यहाँ सिलाई, ड्राइविंग, और मैकेनिक जैसे तकनीकी कार्यों की ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि ये युवा 120 दिनों के भीतर आत्मनिर्भर बनकर अपने पैरों पर खड़े हो सकें। बुधवार को देशभर के साथ मनाया गया यह पर्व इन युवाओं के लिए एक मानसिक और सामाजिक परिवर्तन का बड़ा पड़ाव साबित हुआ।
संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रही महिला नक्सली सरदूल नरेटी ने इस मौके पर अपना अनुभव साझा करते हुए सबको भावुक कर दिया। उन्होंने बताया कि उन्होंने लगभग 17-18 साल नक्सली संगठन में गुजारे, जहाँ जीवन का अर्थ केवल संघर्ष और छिपना था। सरदूल ने कहा, “मैंने अपने जीवन में पहली बार इतनी खुशी के साथ होली मनाई है।” उन्होंने जंगल में भटक रहे अपने अन्य साथियों से भी अपील की कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ें और सरकार की पुनर्वास नीति का लाभ उठाकर मुख्यधारा में लौट आएं।
छत्तीसगढ़ सरकार की नई ‘नक्सलवादी आत्मसमर्पण/पीड़ित राहत पुनर्वास नीति-2025’ रंग लाती दिख रही है। नारायणपुर और कांकेर जैसे संवेदनशील जिलों में स्थापित ट्रांजिट कैंप और पुनर्वास केंद्र भटके हुए युवाओं के लिए उम्मीद की किरण बन रहे हैं। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य इन युवाओं को केवल सरेंडर कराना ही नहीं, बल्कि उन्हें कौशल संपन्न बनाकर समाज में सम्मानपूर्वक पुनर्स्थापित करना है। इस तरह के आयोजनों से समाज में यह संदेश जा रहा है कि विकास और भाईचारे का रास्ता ही स्थायी सुख का एकमात्र मार्ग है।
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