Bengal Bypolls 2026 : पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर मंगलवार, 6 अक्टूबर को होने वाला मतदान केवल दो सीटों का उपचुनाव नहीं माना जा रहा है। मई 2026 में भारतीय जनता पार्टी द्वारा 15 साल पुराने तृणमूल कांग्रेस शासन को समाप्त कर सत्ता संभालने के बाद यह पहला चुनावी परीक्षण है। हालांकि इन उपचुनावों को चार महीने पुरानी सरकार के कामकाज पर सीधा जनादेश नहीं माना जा सकता, लेकिन परिणाम से मतदाताओं की शुरुआती प्रतिक्रिया के संकेत जरूर मिल सकते हैं।
विपक्षी एकता और राजनीतिक ताकत की भी परीक्षा
इन दोनों सीटों के नतीजे यह संकेत भी दे सकते हैं कि बिखरे हुए विपक्ष में कौन-सी पार्टी भाजपा के सामने प्रमुख चुनौती के तौर पर अपनी स्थिति मजबूत कर पाती है। सत्तारूढ़ भाजपा और उसके विरोधी दलों की नजर खास तौर पर अल्पसंख्यक मतदाताओं के मतदान रुझान पर है। दोनों सीटों पर 6 अक्टूबर को मतदान होगा, जबकि मतगणना 9 अक्टूबर को कराई जाएगी।
नंदीग्राम का चुनाव क्यों है खास
नंदीग्राम का उपचुनाव राजनीतिक और प्रतीकात्मक दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही वह क्षेत्र है, जहां ममता बनर्जी के नेतृत्व में भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने तृणमूल कांग्रेस की राजनीति को मजबूत आधार दिया था। इस आंदोलन ने 2011 में राज्य की सत्ता में तृणमूल की वापसी का रास्ता तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 2021 में भाजपा के शुभेंदु अधिकारी ने इसी सीट पर ममता बनर्जी को हराया था।
शुभेंदु अधिकारी ने दो सीटों पर दर्ज की जीत
2026 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों से जीत दर्ज की थी। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने भवानीपुर सीट अपने पास रखी, जिसके कारण नंदीग्राम सीट खाली हो गई और यहां उपचुनाव की आवश्यकता पड़ी। भाजपा ने नंदीग्राम में चंद्रनाथ रथ की मां हासिरानी रथ को उम्मीदवार बनाया है। चंद्रनाथ रथ को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का करीबी सहयोगी बताया जाता था। विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के दो दिन बाद 6 मई को उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन किया
नंदीग्राम में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल धड़े ने पहले संचित प्रधानी डे को उम्मीदवार बनाया था। हालांकि, शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद उन्होंने चुनाव से अपना नाम वापस ले लिया। इसके बाद ममता बनर्जी के धड़े के सामने अपना उम्मीदवार नहीं बचा। ऐसी स्थिति में उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने का फैसला किया। ममता बनर्जी ने इसे विपक्षी सहयोग और इंडिया गठबंधन को मजबूत करने की दिशा में कदम बताया।
पुराने मामलों के बीच मैदान में लौटे मिलन प्रधान
कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को 2007 के नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण आंदोलन से जुड़े पुराने मामलों में गिरफ्तार किया गया था। बाद में उन्हें अंतरिम जमानत मिली और उन्होंने चुनाव प्रचार दोबारा शुरू किया। इस कानूनी घटनाक्रम ने नंदीग्राम के चुनावी मुकाबले को और अधिक चर्चा में ला दिया। मतदान से पहले उनकी जमानत को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा, जहां फिलहाल चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित न करने का रुख सामने आया।
तृणमूल के दूसरे धड़े ने भी उतारा उम्मीदवार
नंदीग्राम में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल के प्रतिद्वंद्वी धड़े ने मोहम्मद एतेशामुल हक को चुनाव मैदान में उतारा है। यह धड़ा अलग अस्थायी पार्टी पहचान और लिफाफा चुनाव चिह्न के साथ चुनाव लड़ रहा है। वहीं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने शांतिगोपाल गिरि को अपना उम्मीदवार बनाया है। इस तरह नंदीग्राम में मुकाबला कई राजनीतिक धड़ों के बीच हो रहा है और ममता बनर्जी के समर्थन से कांग्रेस उम्मीदवार की स्थिति पर भी नजर है।
रेजीनगर में अलग दिखाई दे रहा राजनीतिक समीकरण
रेजीनगर विधानसभा सीट की राजनीतिक तस्वीर नंदीग्राम से अलग है। 2026 के विधानसभा चुनाव में रेजीनगर और नवादा दोनों सीटों से जीत हासिल करने वाले हुमायूं कबीर ने नवादा सीट अपने पास रखी। इसके कारण रेजीनगर सीट खाली हुई। हुमायूं कबीर की पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी ने उनके बेटे गुलाम नबी आजाद को उम्मीदवार बनाया है। कबीर ने रेजीनगर सीट करीब 59 हजार मतों के अंतर से जीती थी।
कई दलों के उम्मीदवार मैदान में
रेजीनगर में भाजपा ने मुर्शिदाबाद जिले के पूर्व अध्यक्ष सखराव सरकार को उम्मीदवार बनाया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल धड़े की ओर से रबीउल आलम चौधरी और प्रतिद्वंद्वी तृणमूल धड़े की ओर से सफीउज्जमान शेख मैदान में हैं। कांग्रेस ने मोहम्मद अब्दुल्लाहिल काफी और माकपा ने सैयद असद अली को उम्मीदवार बनाया है। वहीं रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के विकास चंद्र मिश्रा ने अपना नाम वापस ले लिया।
चुनाव चिह्न को लेकर भी विवाद
रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ने अपने पारंपरिक हंसिया-हथौड़ा चुनाव चिह्न के बजाय बाल्टी का चिह्न आवंटित किए जाने पर आपत्ति जताई थी। इसी तरह आम जनता उन्नयन पार्टी ने भी अपने सीटी चुनाव चिह्न को बदलकर मेज किए जाने पर सवाल उठाया। चुनाव चिह्न से जुड़े इन विवादों ने रेजीनगर के मुकाबले में संगठनात्मक और पहचान से जुड़े मुद्दों को भी सामने ला दिया है।
रेजीनगर में तृणमूल धड़े के सामने बड़ी चुनौती
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल धड़े को भी रेजीनगर में अलग तरह की चुनौती का सामना करना पड़ा। रबीउल आलम चौधरी ने कार्यकर्ताओं पर दबाव और नई पहचान के साथ प्रचार करने में मुश्किलों का हवाला देकर चुनाव से हटने की घोषणा की थी। हालांकि, पार्टी नेतृत्व के साथ बातचीत के बाद उन्होंने अपना फैसला बदल दिया और चुनाव मैदान में बने रहे।
कांग्रेस के लिए दोनों सीटों पर अलग रणनीति
कांग्रेस के लिए नंदीग्राम और रेजीनगर की चुनावी परिस्थितियां एक-दूसरे से काफी अलग हैं। नंदीग्राम में उसे ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल धड़े का समर्थन प्राप्त है, जबकि रेजीनगर में कांग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस नेता प्रदीप भट्टाचार्य ने पार्टी की खोई राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की जरूरत बताई है। वहीं अधीर रंजन चौधरी ने संगठन को दोबारा मजबूत करने पर जोर दिया है।
भाजपा के लिए अल्पसंख्यक वोट अहम
भाजपा के लिए खासकर रेजीनगर का चुनाव महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या काफी अधिक है। पार्टी इस सीट पर अपने जनाधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। शुभेंदु अधिकारी ने उपचुनाव को इस दृष्टि से भी प्रस्तुत किया है कि क्या अल्पसंख्यक मतदाता भाजपा के विकास संबंधी एजेंडे का समर्थन करते हैं।
9 अक्टूबर को सामने आएंगे नतीजे
नंदीग्राम और रेजीनगर में मतदान 6 अक्टूबर को होगा और दोनों सीटों के नतीजे 9 अक्टूबर को घोषित किए जाएंगे। इन परिणामों से भाजपा सरकार के शुरुआती कार्यकाल के प्रति मतदाताओं की प्रतिक्रिया के साथ-साथ विपक्षी दलों की जमीनी स्थिति के संकेत मिल सकते हैं। नंदीग्राम में गठबंधन और समर्थन की रणनीति, जबकि रेजीनगर में संगठन, राजनीतिक पहचान और बिखरे विपक्ष की ताकत—दोनों अलग-अलग मुद्दे चुनाव परिणामों को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाएंगे।
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