Bihar Nilgai Renamed
Bihar Nilgai Renamed : बिहार सरकार ने राज्य में एक ऐतिहासिक और भाषाई बदलाव करते हुए ‘नीलगाय’ शब्द के आधिकारिक इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। मंगलवार को बिहार विधानसभा के सत्र के दौरान उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने सदन को सूचित किया कि अब से इस जानवर को ‘नीलगाय’ के बजाय ‘घोड़पड़ास’ या ‘नील बकरी’ के नाम से संबोधित किया जाएगा। यह निर्णय केवल बोलचाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे सरकारी दस्तावेजों और प्रशासनिक कार्यवाहियों में भी अनिवार्य रूप से लागू किया जाएगा। सरकार का मानना है कि नाम में ‘गाय’ शब्द होने के कारण किसानों और आम जनता के बीच एक धार्मिक और भावनात्मक जुड़ाव पैदा हो जाता है, जो व्यावहारिक समस्याओं के समाधान में बाधा डालता है।
उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने सदन में इस परिवर्तन के पीछे के संवेदनशील कारणों को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि जब किसी जीव के नाम के साथ ‘गाय’ शब्द जुड़ जाता है, तो समाज की धार्मिक भावनाएं उसके संरक्षण और वृद्धि के पक्ष में झुकने लगती हैं। चूंकि नीलगाय वास्तव में मृग (Antelope) प्रजाति का जीव है न कि गौवंश का, इसलिए इसे ‘नील बकरी’ या स्थानीय नाम ‘घोड़पड़ास’ कहना अधिक तर्कसंगत है। विजय सिन्हा के अनुसार, यह कदम समाज की भावनाओं का सम्मान करने और किसानों की समस्याओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
बिहार के अधिकांश जिलों में नीलगाय (अब घोड़पड़ास) किसानों के लिए एक बड़ी मुसीबत बन चुकी है। ये जानवर झुंड में चलते हैं और रातों-रात एकड़ के एकड़ खेत चर जाते हैं या पैरों तले कुचलकर फसल बर्बाद कर देते हैं। अब तक ‘गाय’ शब्द से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के कारण कई किसान इन्हें खेतों से भगाने या इनके खिलाफ सख्त कदम उठाने में संकोच करते थे। सरकार ने पहले ही कई क्षेत्रों में फसलों को बचाने के लिए इन्हें मारने के आदेश जारी किए हैं और इसके लिए पेशेवर शूटरों की सेवाएं भी ली जा रही हैं। नाम बदलने से अब इन अभियानों को सामाजिक विरोध का सामना कम करना पड़ेगा।
एक अनुमान के मुताबिक, बिहार के वैशाली, पूर्वी चंपारण, बक्सर, सीवान और समस्तीपुर जैसे कृषि प्रधान जिलों में ‘घोड़पड़ास’ की संख्या लगभग 3 लाख तक पहुंच गई है। इसके साथ ही करीब 67,000 जंगली सूअर भी फसलों के लिए काल बने हुए हैं। ये जानवर इतने आक्रामक और निडर हो चुके हैं कि किसान अपनी तैयार फसलों की रखवाली के लिए कड़कड़ाती ठंड और अंधेरी रातों में भी जागने को मजबूर हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन जानवरों द्वारा किया जाने वाला नुकसान करोड़ों में है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब से किसी भी विभागीय फाइल, सवाल-जवाब के सत्रों या कृषि योजनाओं में ‘नीलगाय’ शब्द का प्रयोग नहीं होगा। वन एवं पर्यावरण विभाग को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने रिकॉर्ड्स में आवश्यक संशोधन करें। प्रशासनिक स्तर पर यह बदलाव इसलिए भी जरूरी है ताकि योजनाओं के क्रियान्वयन के दौरान किसी भी प्रकार का भ्रम पैदा न हो। अब जब भी जंगली जानवरों से फसलों के नुकसान की भरपाई या नियंत्रण की बात होगी, तो उसे ‘घोड़पड़ास नियंत्रण योजना’ के तहत देखा जाएगा।
बिहार सरकार का यह कदम प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ व्यावहारिक भी है। नाम बदलकर सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह किसानों की आजीविका को प्राथमिकता दे रही है। धार्मिक प्रतीकों और वन्यजीव प्रबंधन के बीच के अंतर को स्पष्ट करके, राज्य सरकार ने कृषि संकट को दूर करने के लिए एक नया रास्ता चुना है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस भाषाई परिवर्तन का जमीनी स्तर पर फसलों की सुरक्षा और किसानों के मनोबल पर कितना प्रभाव पड़ता है।
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