Bilaspur Crime : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के सिरगिट्टी थाना क्षेत्र से एक बेहद घिनौनी और रूह कंपा देने वाली वारदात सामने आई है। यहाँ एक 17 वर्षीय नाबालिग लड़के ने चॉकलेट देने का झांसा देकर 7 साल की दो सगी मासूम बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाया। आरोपी ने न सिर्फ उनके साथ दुष्कर्म किया, बल्कि विरोध करने पर उनके साथ बेरहमी से मारपीट भी की। घटना का खुलासा तब हुआ जब पीड़ित बच्चियों के परिजनों ने आरोपी को रंगे हाथों पकड़ने का प्रयास किया, लेकिन वह चकमा देकर मौके से भाग निकला। इस पूरे मामले में पीड़ित बच्चियों की बेबस मां ने स्थानीय पुलिस प्रशासन पर बेहद गंभीर और चौंकाने वाले आरोप लगाए हैं, जिससे खाकी की भूमिका पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।

पुलिस प्रशासन पर संगीन आरोप
पीड़ित बच्चियों की मां का साफ कहना है कि घटना की तत्काल लिखित शिकायत देने के बावजूद सिरगिट्टी थाना पुलिस आरोपी लड़के को गिरफ्तार करने के बजाय उसकी मां से लगातार कूटनीतिक बातचीत करने में मशगूल रही। मां का आरोप है कि लड़के के परिवार ने मामले को दबाने के लिए पुलिसकर्मियों को 10-20 हजार रुपए की रिश्वत देने की पेशकश भी की थी। जब पीड़ित परिवार ने पुलिस की इस सुस्ती और गिरफ्तारी में जानबूझकर की जा रही देरी पर कड़ा ऐतराज जताया, तब कहीं जाकर पुलिस नाममात्र की कार्रवाई करते हुए आरोपी लड़के को थाने लेकर आई। पीड़ित पक्ष ने पुलिस पर सबूत नष्ट करने, एफआईआर में जानबूझकर देरी करने और आरोपी को हवालात के बजाय वीआईपी सुविधाएं देने का आरोप लगाया है।

रस्सी से बांधकर दरिंदगी करता था आरोपी, पुलिस ने नहीं जुटाए सबूत
परिजनों के मुताबिक, आरोपी नाबालिग लड़का पिछले कई दिनों से बच्चियों को अकेला पाकर उनके साथ गलत हरकतें कर रहा था। आखिरकार 27 मई को परिजनों ने उसे रंगे हाथों दबोच लिया। हैरान करने वाली बात यह है कि वह दरिंदगी के वक्त बच्चियों को रस्सी से बांधकर रखता था ताकि वे शोर न मचा सकें। पुलिस ने दबाव में आकर 29 मई को आरोपी को पकड़ तो लिया, लेकिन अपराध स्थल से घटना से जुड़े महत्वपूर्ण सामान जैसे रस्सी और अन्य सबूतों को जब्त नहीं किया। परिजनों ने पुलिस को इन सबूतों को तुरंत सुरक्षित करने को कहा था, लेकिन सिरगिट्टी पुलिस की इस घोर लापरवाही से अब जरूरी फोरेंसिक सबूतों के हमेशा के लिए नष्ट होने की गंभीर आशंका पैदा हो गई है।
उच्च अधिकारियों के दखल के बाद दर्ज हुई FIR
इस जघन्य अपराध की जानकारी देने के बाद भी स्थानीय पुलिस ने केस दर्ज करने में टालमटोल की। पीड़ित परिवार न्याय के लिए सुबह से लेकर देर रात तक थाने और बड़े अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काटता रहा। आखिरकार जब मामले में जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया, तब कहीं जाकर रिपोर्ट दर्ज की गई। हद तो तब हो गई जब मेडिकल रिपोर्ट में बच्चियों के निजी अंगों में गंभीर चोट और दर्द की पुष्टि होने के बावजूद पुलिस ने आरोपी की मेडिकल रिपोर्ट को ‘नील’ (सामान्य) दिखा दिया। इसके अलावा, मासूम बच्चियों से बार-बार असंवेदनशील पूछताछ कर उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है ताकि केस को कमजोर किया जा सके।
समझौते के लिए बनाया जा रहा मानसिक दबाव
पीड़ित मां का आरोप है कि सिरगिट्टी थाना प्रभारी और जांच अधिकारी केस की निष्पक्ष विवेचना करने के बजाय मामले को रफा-दफा करने के लिए उन पर लगातार मानसिक दबाव बना रहे हैं। पुलिस पीड़ित परिवार को ज्ञान दे रही है कि आरोपी पड़ोस का ही है, इसलिए मामला यहीं सुलझा लो। इसके विपरीत, थाने में आरोपी की मां को सम्मान के साथ बैठाया गया है और उनका परिवार दिन में तीन-तीन बार आकर आरोपी से मिल रहा है। पीड़ित परिवार को थाने में कड़ी धूप में बैठाया जाता है, जबकि आरोपी पक्ष को संरक्षण मिल रहा है। आरोपी पक्ष अब पीड़ित परिवार को केस वापस न लेने पर जान से मारने की धमकियां दे रहा है, जिससे पूरे इलाके में भय का माहौल है।
पीड़ित परिवार की बिलासपुर एसएसपी से गुहार
इस अन्याय के खिलाफ पीड़ित परिवार ने बिलासपुर एसएसपी रजनेश सिंह से मुलाकात कर एक ज्ञापन सौंपा है और केंद्रीय गृहमंत्री को भी पत्र लिखकर सुरक्षा की मांग की है। पीड़ित परिवार ने अपनी 7 सूत्रीय मांगों में कहा है कि:
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इस पूरे संवेदनशील केस की जांच किसी उच्च और स्वतंत्र पुलिस अधिकारी को सौंपी जाए।
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अपराध स्थल से जुड़े सभी साक्ष्यों को तुरंत फोरेंसिक जांच के लिए जब्त किया जाए।
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एफआईआर में देरी करने वाले दोषी पुलिसकर्मियों की अलग से विभागीय जांच हो।
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सिरगिट्टी थाना प्रभारी अभय सिंह बैस, सब-इंस्पेक्टर शीतल प्रसाद त्रिपाठी और जांच अधिकारी संतोषी अग्रवाल को तुरंत पद से हटाया जाए।
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जांच पूरी होने तक इन सभी विवादित अधिकारियों को इस केस की फाइल से पूरी तरह दूर रखा जाए।
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पीड़ित बच्चियों और उनके डरे हुए परिवार को तत्काल चौबीस घंटे पुलिस सुरक्षा मुहैया कराई जाए।
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मामले की बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक भेदभाव के समय सीमा के भीतर निष्पक्ष जांच कर दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाए।
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