Bor Tiger Reserve
Bor Tiger Reserve: महाराष्ट्र के वर्धा जिले में स्थित सेलू क्षेत्र के बोर व्याघ्र परियोजना (Bor Tiger Reserve) से एक चिंताजनक खबर सामने आ रही है। भीषण गर्मी और प्रबंधन की कमी के कारण इस समय पूरा अभयारण्य गंभीर जल संकट की चपेट में है। जंगल के भीतर प्राकृतिक जलस्रोत सूखने की वजह से वन्यजीवों का जीवन दांव पर लग गया है। स्थिति इतनी विकट हो गई है कि प्यास से व्याकुल जंगली जानवर अब पानी की तलाश में रिहायशी इलाकों का रुख कर रहे हैं, जिससे मानव और वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ने की आशंका प्रबल हो गई है।
बोर टाइगर रिजर्व की सबसे प्रसिद्ध ‘कैटरीना’ बाघिन इन दिनों अपने शावकों के साथ जंगल छोड़कर बोरी गांव के बाहरी इलाके में डेरा डाले हुए है। बाघिन की मौजूदगी ने स्थानीय ग्रामीणों की नींद उड़ा दी है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बाघिन को अपने शावकों के साथ गांव के पास देखा गया है, जिसके बाद से पूरे इलाके में सन्नाटा पसरा हुआ है। लोग घरों से बाहर निकलने में डर रहे हैं और शाम होते ही बस्तियों में सन्नाटा छा जाता है। प्रशासन द्वारा बाघिन की गतिविधियों पर नजर रखने के दावे तो किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर ग्रामीण खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, बोर व्याघ्र परियोजना क्षेत्र में लगभग 75 से 80 प्राकृतिक और कृत्रिम जलस्रोत हैं। विडंबना यह है कि भीषण गर्मी की शुरुआत में ही इनमें से अधिकांश जलस्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं। वन विभाग के पास वर्तमान में केवल दो पानी के टैंकर उपलब्ध हैं, जो इतने विशाल क्षेत्र में जलापूर्ति करने के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। संसाधनों की इस भारी कमी के कारण वन्यजीवों तक पर्याप्त पानी नहीं पहुँच पा रहा है। विभागीय अधिकारियों की सुस्ती और प्रबंधन की विफलता के कारण वन्यजीव तड़पने को मजबूर हैं।
आश्चर्य की बात यह है कि गर्मी के मौसम की तैयारियों के लिए जो बजट और योजनाएं बनाई जाती हैं, उनका क्रियान्वयन समय पर नहीं किया गया। जलस्रोतों की मरम्मत और गाद निकालने जैसे महत्वपूर्ण कार्य अभी भी अधूरे पड़े हैं। यदि समय रहते सौर पंपों और कृत्रिम तालाबों की देखरेख की गई होती, तो आज बाघों और अन्य जानवरों को पानी के लिए भटकना नहीं पड़ता। वन प्रबंधन की इस लापरवाही का खामियाजा अब मूक जानवरों को भुगतना पड़ रहा है, जो मजबूरी में सुरक्षित जंगलों को छोड़कर मानव बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं।
जंगल से निकलकर बाघ, तेंदुए और अन्य जंगली जानवर अब सीधे किसानों के खेतों में घुस रहे हैं। इससे न केवल फसलों को नुकसान पहुँच रहा है, बल्कि खेतों में काम करने वाले मजदूरों की जान पर भी बन आई है। डर के कारण मजदूरों ने खेतों में जाने से मना कर दिया है, जिससे कृषि कार्य पूरी तरह ठप पड़ गया है। किसानों का कहना है कि एक तरफ फसल बर्बाद हो रही है और दूसरी तरफ जान का खतरा बना हुआ है। इलाके में आर्थिक गतिविधियां रुकने से स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ रहा है।
स्थानीय लोगों ने वर्धा जिला प्रशासन और वन विभाग के प्रति भारी नाराजगी व्यक्त की है। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि यदि प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से जंगल के भीतर पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की और कैटरीना बाघिन की सुरक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो वे तीव्र आंदोलन के लिए मजबूर होंगे। उन्होंने मांग की है कि टैंकरों की संख्या बढ़ाई जाए और वन्यजीवों को जंगल के भीतर ही रोकने के लिए प्रभावी घेराबंदी की जाए।
बोर टाइगर रिजर्व की यह स्थिति शासन-प्रशासन के लिए एक चेतावनी है। वन्यजीव संरक्षण केवल कागजों तक सीमित नहीं होना चाहिए। अगर जल्द ही वर्धा प्रशासन ने इस जल संकट का स्थायी समाधान नहीं निकाला, तो हमें किसी बड़ी अनहोनी या कीमती वन्यजीवों की मौत की खबर सुनने को मिल सकती है।
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