BSP decline 2026
BSP decline 2026: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाने वाली बहुजन समाज पार्टी (BSP) आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। कांशीराम द्वारा स्थापित और मायावती के नेतृत्व में चार बार उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालने वाली यह पार्टी अब अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। चुनावी आंकड़ों और सदन में घटती संख्या को देखें तो बसपा की राजनीतिक जड़ें कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं। आगामी दो वर्षों में पार्टी के सामने ऐसा समय आने वाला है जब देश की संसद के दोनों सदनों में बसपा का एक भी प्रतिनिधि मौजूद नहीं होगा।
बहुजन समाज पार्टी के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय संसद में उसकी खत्म होती मौजूदगी है। वर्तमान में राज्यसभा में बसपा के केवल एक सांसद रामजी गौतम बचे हैं। रामजी गौतम का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त होने जा रहा है। उत्तर प्रदेश की मौजूदा विधानसभा में बसपा की संख्या बल इतनी कम है कि वह अपने दम पर दोबारा किसी को उच्च सदन (राज्यसभा) नहीं भेज सकती। इसका सीधा अर्थ यह है कि 2026 के अंत तक भारतीय संसद में बसपा का प्रतिनिधित्व ‘शून्य’ हो जाएगा, जो पार्टी के इतिहास में एक बड़ी गिरावट का संकेत है।
उत्तर प्रदेश, जो कभी बसपा का अभेद्य किला माना जाता था, वहां अब पार्टी की हालत दयनीय है। 403 सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा का महज एक विधायक है। वहीं, विधान परिषद (MLC) में तो पार्टी का खाता भी नहीं खुला है। 2024 की शुरुआत में बसपा के एकमात्र एमएलसी भीमराव अंबेडकर का कार्यकाल समाप्त होने के बाद से उच्च सदन में पार्टी का कोई सदस्य नहीं बचा है। सत्ता के गलियारों में मायावती की पार्टी की यह अनुपस्थिति बताती है कि जमीनी स्तर पर पार्टी का जनाधार कितनी तेजी से खिसका है।
नवंबर 2026 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के 10 सांसदों का कार्यकाल पूरा हो रहा है। इन 10 सीटों में से 8 वर्तमान में भाजपा के पास हैं, 1 सपा (रामगोपाल यादव) और 1 बसपा (रामजी गौतम) के पास है। नियमानुसार, राज्यसभा सीट जीतने के लिए विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है। बसपा के पास केवल एक विधायक होने के कारण वह रेस से पूरी तरह बाहर है। भाजपा और समाजवादी पार्टी अपनी संख्या बल के आधार पर इन सीटों को आपस में बांट लेंगी, जिससे मायावती की पार्टी के पास हाथ मलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
2024 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न जीत पाने के बाद अब बसपा की सारी उम्मीदें 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर टिकी हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि 2027 में भी पार्टी चमत्कारिक प्रदर्शन नहीं कर पाती है, तो उसका भविष्य और अंधकारमय हो जाएगा। 2026 में राज्यसभा से बाहर होने के बाद पार्टी को 2029 के लोकसभा चुनाव तक संसद में अपनी बात रखने का कोई मौका नहीं मिलेगा। यह लंबा इंतजार संगठन को और अधिक कमजोर कर सकता है, क्योंकि बिना संसदीय प्रतिनिधित्व के पार्टी की आवाज राष्ट्रीय पटल पर धीमी पड़ जाती है।
बसपा का यह सफर बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 1984 में मान्यवर कांशीराम ने शोषितों और वंचितों की आवाज उठाने के लिए बसपा का गठन किया था। 1989 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने पहली बार 3 सांसद भेजकर अपनी धमक दिखाई थी, जिनमें स्वयं मायावती शामिल थीं। 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली पार्टी का 2026 तक संसद में जीरो पर आ जाना एक राजनीतिक त्रासदी जैसा है। क्या मायावती अपनी पुरानी सोशल इंजीनियरिंग के जरिए दोबारा वापसी कर पाएंगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
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