Cancer Recurrence : कैंसर का इलाज पूरा होने के बाद जब मरीज स्वस्थ महसूस करने लगता है, तब बीमारी के दोबारा लौटने की आशंका उसके लिए चिंता का कारण बन सकती है। हाल ही में दिग्गज अभिनेता मुश्ताक खान की कैंसर से मौत की खबर के बाद कैंसर के दोबारा होने यानी रिलैप्स को लेकर चर्चा बढ़ी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्हें पहले कैंसर हुआ था और उपचार के बाद वह ठीक हो गए थे, लेकिन निधन से कुछ दिन पहले बीमारी गंभीर रूप में दोबारा सामने आई। वह मुंबई के नानावती अस्पताल में करीब 15 दिनों तक उपचाराधीन रहे और आईसीयू में उनका निधन हुआ।
कैंसर रिलैप्स का क्या मतलब होता है
नई दिल्ली के पीएसआरआई अस्पताल के वरिष्ठ सलाहकार हेमेटोलॉजिस्ट और ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अमित उपाध्याय के मुताबिक, रिलैप्स का अर्थ है कि इलाज के बाद रोग के नियंत्रण में आने और मरीज के रोग-मुक्त दिखाई देने के बावजूद कैंसर दोबारा सामने आ जाए। उपचार के बाद जांच में कैंसर का पता नहीं चलना हमेशा यह साबित नहीं करता कि शरीर में कैंसर की प्रत्येक कोशिका पूरी तरह समाप्त हो चुकी है।
कुछ कोशिकाएं लंबे समय तक रह सकती हैं
विशेषज्ञ के अनुसार, कुछ मामलों में कैंसर की बेहद कम संख्या में कोशिकाएं उपचार के बाद भी शरीर में मौजूद रह सकती हैं। ये कोशिकाएं कुछ समय तक निष्क्रिय अवस्था में रह सकती हैं और महीनों या वर्षों बाद दोबारा सक्रिय होकर बढ़ना शुरू कर सकती हैं। यही वजह है कि कैंसर का इलाज पूरा होने के बाद भी नियमित फॉलोअप और डॉक्टर द्वारा बताई गई जांचों को जारी रखना महत्वपूर्ण होता है।
कैंसर दोबारा होना कितना गंभीर है
कैंसर का दोबारा सामने आना गंभीर स्थिति हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर मामले में उपचार के विकल्प खत्म हो जाते हैं। बीमारी के दोबारा लौटने के बाद उपचार कई महत्वपूर्ण बातों पर निर्भर करता है। इनमें कैंसर का दोबारा शरीर के किस हिस्से में होना, उसका सीमित रहना या अन्य अंगों तक फैलना और पहले हुए कैंसर का प्रकार एवं स्टेज शामिल हैं।
इलाज मरीज की स्थिति के अनुसार तय होता है
डॉक्टर के अनुसार, उपचार का फैसला इस बात पर भी निर्भर करता है कि मूल कैंसर के इलाज को कितना समय बीता है, बीमारी दोबारा आने के बाद उपचार के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देती है और मरीज की सामान्य स्वास्थ्य स्थिति कैसी है। पहले दिए गए उपचार को भी ध्यान में रखा जाता है। इसलिए कैंसर के दोबारा होने पर सभी मरीजों के लिए एक जैसा उपचार नहीं होता।
कुछ मामलों में आक्रामक उपचार जरूरी
कुछ परिस्थितियों में डॉक्टर बीमारी को नियंत्रित करने के लिए दोबारा अपेक्षाकृत तेज या आक्रामक उपचार अपना सकते हैं। वहीं कुछ मामलों में उपचार का उद्देश्य बीमारी को नियंत्रित रखना और मरीज के जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाए रखना हो सकता है। उपचार की योजना कैंसर के प्रकार, फैलाव और मरीज की व्यक्तिगत स्थिति के आधार पर विशेषज्ञ तय करते हैं।
किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए
कैंसर का उपचार करा चुके लोगों को शरीर में होने वाले नए, लगातार बने रहने वाले या असामान्य बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। बिना स्पष्ट कारण वजन कम होना, लगातार थकान, शरीर में नई गांठ या सूजन, लगातार दर्द और लंबे समय तक बनी रहने वाली खांसी ऐसे संकेत हैं जिनकी चिकित्सकीय जांच जरूरी हो सकती है।
सांस फूलना और ब्लीडिंग भी हो सकती है चेतावनी
इसके अलावा बिना स्पष्ट कारण सांस फूलना, मल त्याग या पेशाब की आदतों में बदलाव, असामान्य रक्तस्राव और लंबे समय तक भूख कम लगना भी ऐसे लक्षण हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हालांकि इन लक्षणों का मतलब हमेशा कैंसर की वापसी नहीं होता। कई अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी इनके पीछे हो सकती हैं।
नियमित फॉलोअप है बेहद जरूरी
कैंसर का इलाज पूरा होने के बाद नियमित रूप से डॉक्टर के संपर्क में रहना महत्वपूर्ण है। डॉक्टर द्वारा सुझाई गई जांच और फॉलोअप समय पर कराने से स्वास्थ्य में होने वाले बदलावों की निगरानी की जा सकती है। यदि कोई नया या लगातार बना रहने वाला लक्षण दिखाई दे, तो खुद से निष्कर्ष निकालने के बजाय विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है। कैंसर की दोबारा पहचान और उपचार का निर्णय जांच तथा चिकित्सकीय मूल्यांकन के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
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