CG Madarsa Board : छत्तीसगढ़ में शिक्षा प्रणाली और मदरसों के स्वरूप को लेकर एक नई और गंभीर बहस छिड़ गई है। छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को एक पत्र लिखकर राज्य में चल रहे ‘मदरसा बोर्ड’ को समाप्त करने की पुरजोर सिफारिश की है। इस मांग ने राज्य के राजनीतिक और शैक्षणिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। डॉ. राज ने अपने पत्र में उत्तराखंड के मॉडल का हवाला देते हुए सुझाव दिया है कि छत्तीसगढ़ में भी मदरसा बोर्ड को भंग कर दिया जाना चाहिए।

आधुनिक शिक्षा की आवश्यकता: ‘एक हाथ में कुरान, दूसरे में कंप्यूटर’
इस मांग के पीछे मुख्य तर्क मदरसों में दी जाने वाली शिक्षा के आधुनिकीकरण का है। डॉ. सलीम राज का मानना है कि केवल धार्मिक शिक्षा से विद्यार्थियों का भविष्य उज्ज्वल नहीं हो सकता। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन “एक हाथ में कुरान और दूसरे में कंप्यूटर” का उल्लेख करते हुए कहा कि मदरसों के छात्रों को भी आज के दौर की प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया के लिए तैयार करने की आवश्यकता है। उनका उद्देश्य यह है कि मदरसों के बच्चे भी भविष्य में डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और प्रशासनिक अधिकारी बनकर राष्ट्र के विकास में योगदान दें।

अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन का सुझाव
मदरसा बोर्ड को खत्म करने की बात कहने के साथ ही, डॉ. राज ने एक वैकल्पिक व्यवस्था का भी प्रस्ताव रखा है। उन्होंने राज्य में ‘अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ (Minority Education Authority) गठित करने की सिफारिश की है। इस प्राधिकरण का प्राथमिक उद्देश्य यह होगा कि यह संस्था अल्पसंख्यक विद्यार्थियों को धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा सुनिश्चित करे। डॉ. राज के अनुसार, यह नई व्यवस्था छात्रों को वैश्विक स्तर की शिक्षा और करियर के बेहतर अवसर उपलब्ध कराने में सहायक सिद्ध होगी।
उत्तराखंड मॉडल और शैक्षणिक बदलाव की उम्मीद
डॉ. सलीम राज ने अपने सुझाव के समर्थन में उत्तराखंड राज्य का उदाहरण दिया है, जहाँ 1 जुलाई से मदरसा बोर्ड को समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। वक्फ बोर्ड अध्यक्ष का मानना है कि यदि छत्तीसगढ़ में भी इसी मॉडल को लागू किया जाता है, तो राज्य की अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार आएगा। उनका कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी प्रकार का बदलाव छात्रों के हित में ही होता है और मदरसों में आधुनिक विषयों को अनिवार्य बनाकर ही उन्हें मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जा सकता है।
सियासी पारा गरमाया: भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने
इस प्रस्ताव के सार्वजनिक होते ही राज्य की राजनीति गरमा गई है। भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने इस विचार का समर्थन करते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य प्रोफेशनल और समान अवसर प्रदान करना है, जिससे छात्रों का सर्वांगीण विकास हो सके। वहीं, दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राज्य सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने इस कदम को हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति करार दिया है और सरकार को सुझाव दिया कि उन्हें पहले सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि राज्य सरकार इस संवेदनशील प्रस्ताव पर क्या निर्णय लेती है।
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