CG-PSC 2003 Scam
CG-PSC 2003 Scam : छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CG-PSC) की साल 2003 की परीक्षा में हुई गड़बड़ी का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया है। दो दशकों से लंबित इस मामले में अब देश की सर्वोच्च अदालत ने सुलह-समझौते के जरिए विवाद सुलझाने की पहल की है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बहुचर्चित केस को ‘समाधान समारोह’ (विशेष लोक अदालत) में शामिल किया है। हालांकि, मुख्य याचिकाकर्ता वर्षा डोंगरे के सख्त रुख ने इस समझौते की संभावनाओं पर सवालिया निशान लगा दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पुराने विवाद को आपसी सहमति से खत्म करने के लिए याचिकाकर्ता वर्षा डोंगरे, छत्तीसगढ़ सरकार और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है। इन सभी पक्षों को मुंगेली और कबीरधाम के जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों में उपस्थित होने के लिए कहा गया है। लेकिन वर्षा डोंगरे ने साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार और मेरिट के मामले में समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है। उनका तर्क है कि जब हाई कोर्ट पहले ही उनके पक्ष में फैसला दे चुका है, तो उसे लागू किया जाना चाहिए न कि उस पर समझौता हो।
साल 2017 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। कोर्ट ने तत्कालीन चयन सूची को रद्द करते हुए आयोग को आदेश दिया था कि वह नए सिरे से मेरिट लिस्ट तैयार करे। यदि इस फैसले पर अमल होता, तो वर्तमान में तैनात कई बड़े अधिकारी, जिनमें आधा दर्जन डिप्टी कलेक्टर शामिल हैं, अपनी वरिष्ठता खो देते या पद से नीचे चले जाते। इसी डर से प्रभावित अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां हाई कोर्ट के आदेश पर ‘स्टे’ (रोक) लग गया और मामला तब से विचाराधीन है।
इस घोटाले की जड़ें साल 2005 में तब गहरी हुईं जब सूचना का अधिकार (RTI) कानून लागू हुआ। रविंद्र सिंह और वर्षा डोंगरे जैसे उम्मीदवारों ने जब अपनी उत्तर पुस्तिकाएं देखीं, तो धांधली के रोंगटे खड़े कर देने वाले सबूत मिले। दस्तावेजों से पता चला कि एक विषय में महज एक पेज लिखने वाले उम्मीदवार को 60 में से 55 अंक दिए गए, जबकि उसी विषय में बेहतरीन जवाब लिखने वाले मेधावी छात्रों को 10-15 अंकों पर समेट दिया गया। स्केलिंग और अंकों के वितरण में की गई इस मनमानी ने पीएससी की साख पर बट्टा लगा दिया था।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि साल 2003 मुख्य परीक्षा के सभी वैकल्पिक विषयों की री-स्केलिंग की जाए। विशेष रूप से मानव विज्ञान (Anthropology) के पेपर की जांच दोबारा तय मापदंडों पर करने को कहा गया था। इस प्रक्रिया से सीधे तौर पर 147 चयनित अधिकारी प्रभावित हो रहे थे। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईमानदारी से री-स्केलिंग हुई, तो वर्तमान में कार्यरत कई अधिकारी मेरिट लिस्ट से बाहर हो जाएंगे और नए हकदार उम्मीदवारों को सरकारी सेवा में आने का मौका मिलेगा।
पीएससी ने 2005 में ही स्वीकार कर लिया था कि चयन प्रक्रिया में कुछ गलतियां हुई थीं, लेकिन सुधार के बजाय मामला अदालतों में उलझता गया। वर्तमान में मामला सुप्रीम कोर्ट में है और ‘समाधान समारोह’ के जरिए इसे खत्म करने की कोशिश हो रही है। लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे पिछले 20 सालों से न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं, और वे किसी भी कीमत पर उन लोगों के साथ समझौता नहीं करेंगे जिन्होंने मेधावी छात्रों के हक पर डाका डाला है। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं।
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