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Chabahar Port: अमेरिकी प्रतिबंधों से खतरे में चाबहार प्रोजेक्ट? भारत की कूटनीतिक घेराबंदी शुरू

Chabahar Port:  ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह को लेकर भारत की चुनौतियां बढ़ती नजर आ रही हैं। 26 अप्रैल 2026 को इस परियोजना के लिए अमेरिका द्वारा दी गई प्रतिबंधों की रियायत खत्म हो गई है। इस संवेदनशील मोड़ पर भारत सरकार ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा है कि वह अमेरिका और ईरान दोनों के साथ गहन संपर्क में है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पश्चिम एशिया में चल रहा वर्तमान तनाव इस पूरी प्रक्रिया को और अधिक पेचीदा बना रहा है।

प्रतिबंधों की छूट खत्म होने से बढ़ा कूटनीतिक दबाव

सोमवार को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान चाबहार परियोजना की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्वीकार किया कि रविवार को अमेरिका द्वारा दी गई प्रतिबंध छूट की समय-सीमा समाप्त हो चुकी है। जायसवाल ने कहा, “चाबहार बंदरगाह का मामला वर्तमान में ईरान और अमेरिका के साथ चर्चा के अधीन है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि इस मुद्दे पर भारत की नजर बनी हुई है और कूटनीतिक रास्ते तलाशे जा रहे हैं ताकि परियोजना की प्रगति बाधित न हो।

पश्चिम एशिया का संघर्ष: एक बड़ी जटिलता

मौजूदा भू-राजनीतिक परिदृश्य, विशेषकर पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में जारी युद्ध और अस्थिरता, चाबहार परियोजना के लिए सबसे बड़ा रोड़ा बनकर उभरी है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, “मौजूदा संघर्ष एक जटिल कारक है।” अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण भारत को संतुलन बनाने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। भारत चाहता है कि चाबहार के माध्यम से वह मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाए रखे, लेकिन क्षेत्रीय युद्ध की स्थिति ने सुरक्षा और कूटनीति के मोर्चे पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

चाबहार बंदरगाह: अफगानिस्तान और मध्य एशिया का प्रवेश द्वार

चाबहार बंदरगाह परियोजना महज एक बुनियादी ढांचा नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक दूरदृष्टि का हिस्सा है। इसकी परिकल्पना मुख्य रूप से अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और उसे समुद्र तक सीधी पहुंच प्रदान करने के लिए की गई थी। पाकिस्तान को बायपास करते हुए भारत इस बंदरगाह के जरिए अफगानिस्तान और पश्चिम एशिया के साथ अपने व्यापारिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत करना चाहता है। यह बंदरगाह भारत के लिए ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ (INSTC) का भी एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।

फरवरी 2026 में संसद को दी गई थी चेतावनी

भारत सरकार ने फरवरी 2026 में ही संसद को सूचित किया था कि 16 सितंबर 2025 को अमेरिकी विदेश विभाग ने ‘ईरान स्वतंत्रता और परमाणु अप्रसार अधिनियम, 2012’ के तहत दी गई रियायतों को रद्द करने की दिशा में कदम उठाए थे। हालांकि, बाद में चर्चाओं के जरिए इस छूट को 26 अप्रैल 2026 तक विस्तार मिला था। सरकार ने लोकसभा में लिखित उत्तर में बताया था कि वह इन घटनाक्रमों से होने वाले संभावित प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के लिए निरंतर बातचीत कर रही है।

आगे की राह और कूटनीतिक वार्ता

वर्तमान स्थिति में भारत सरकार सभी संबंधित पक्षों—अमेरिका, ईरान और अफगानिस्तान—के साथ उच्च स्तरीय बातचीत में जुटी है। लक्ष्य यह है कि चाबहार को अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे से बाहर रखा जाए, जैसा कि पहले भी होता आया है। भारत के लिए यह न केवल आर्थिक हित का विषय है, बल्कि क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य है। मंत्रालय ने कहा है कि जैसे-जैसे वार्ता आगे बढ़ेगी और स्थिति में बदलाव आएगा, देश को इसके बारे में अवगत कराया जाएगा।

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