Chhattisgarh High Court : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता की याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने पीड़िता की 25 सप्ताह की गर्भावस्था को चिकित्सकीय प्रक्रिया के माध्यम से समाप्त करने की अनुमति प्रदान की। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि किसी पीड़िता को उसकी इच्छा के विरुद्ध अनचाही गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि पीड़िता को 24 घंटे के भीतर सरकारी अस्पताल में भर्ती कर नियमानुसार आवश्यक चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी की जाए।

गर्भपात की अनुमति के लिए दायर की गई थी याचिका
रायपुर निवासी नाबालिग पीड़िता ने गर्भपात की अनुमति प्राप्त करने के लिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया था कि उसकी चिकित्सकीय स्थिति और परिस्थितियों को देखते हुए गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी जाए। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान विस्तृत चिकित्सकीय परीक्षण कराने का निर्णय लिया।

मेडिकल बोर्ड गठित करने के दिए थे निर्देश
सुनवाई के शुरुआती चरण में हाईकोर्ट ने रायपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) को विशेषज्ञ चिकित्सकों का मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा था कि किसी भी अंतिम निर्णय से पहले पीड़िता की स्वास्थ्य स्थिति का विशेषज्ञों द्वारा परीक्षण आवश्यक है। साथ ही मेडिकल बोर्ड को निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए गए थे।
विशेषज्ञ डॉक्टरों ने किया स्वास्थ्य परीक्षण
हाईकोर्ट के आदेश के बाद स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों सहित विभिन्न चिकित्सकों का एक मेडिकल बोर्ड गठित किया गया। बोर्ड ने निर्धारित तिथि पर पीड़िता का स्वास्थ्य परीक्षण किया और उसकी शारीरिक स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन किया। मेडिकल रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई, जिसके आधार पर अदालत ने मामले के सभी तथ्यों और चिकित्सकीय पहलुओं पर विचार किया।
आरोपी पर शादी का झांसा देकर दुष्कर्म का आरोप
मामले के अनुसार, रायपुर जिले की रहने वाली नाबालिग पीड़िता ने आरोप लगाया था कि एक युवक ने उसे विवाह का भरोसा दिलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया। शिकायत के अनुसार, इसी दौरान वह गर्भवती हो गई। बाद में आरोपी ने विवाह करने से इनकार कर दिया। इसके बाद पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिस पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
पुलिस जांच के बाद आरोपी को भेजा गया जेल
पुलिस ने शिकायत की जांच के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों और पीड़िता के बयान के आधार पर आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की। जांच पूरी होने के बाद आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक प्रक्रिया के तहत जेल भेज दिया गया। हालांकि, आरोपी की गिरफ्तारी के बावजूद पीड़िता की गर्भावस्था से जुड़ी समस्या बनी रही, जिसके समाधान के लिए उसने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का भी किया गया उल्लेख
याचिका की सुनवाई के दौरान पीड़िता की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख किया गया। वहीं, राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि अंतिम आदेश पारित करने से पहले पीड़िता का विस्तृत चिकित्सकीय परीक्षण आवश्यक है। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों, मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित कानूनी सिद्धांतों पर विचार करने के बाद अपना निर्णय सुनाया।
अदालत ने मौलिक अधिकारों पर दिया विशेष जोर
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि प्रत्येक महिला और बालिका को अपने शरीर और स्वास्थ्य से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार है तथा कानून ऐसे मामलों में पीड़िता की गरिमा, स्वास्थ्य और अधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता देता है। अदालत ने संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों को निर्देश दिया कि पूरी चिकित्सकीय प्रक्रिया कानून और चिकित्सा मानकों के अनुरूप सुरक्षित तरीके से पूरी की जाए, ताकि पीड़िता के स्वास्थ्य और हितों की पूरी तरह रक्षा सुनिश्चित हो सके।
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