Adult Daughter Maintenance : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने देश में बेटियों के कानूनी और सामाजिक अधिकारों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने ऐतिहासिक आदेश में पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी बेटी के केवल बालिग (18 वर्ष की आयु पार) हो जाने मात्र से एक पिता की अपनी संतान के प्रति नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती है।

विशेषकर ऐसे मामलों में जहां किसी सक्षम न्यायालय द्वारा बेटी के पक्ष में पहले से ही भरण-पोषण (मेंटेनेंस) का न्यायिक आदेश लागू हो, वहां पिता अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता। हाईकोर्ट ने इस मामले में पिता द्वारा दायर की गई पुनर्विचार याचिका को सिरे से खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) के उस पुराने आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा है, जिसके तहत बेटी को हर महीने ₹5,000 की राशि देने का निर्देश दिया गया था।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने खारिज की याचिका
यह महत्वपूर्ण कानूनी फैसला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की एकल पीठ (सिंगल बेंच) द्वारा सुनाया गया है। यह पूरा मामला प्रदेश के नवगठित मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिले से संबंधित है। मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता पिता गोरखनाथ यादव ने फैमिली कोर्ट मनेंद्रगढ़ द्वारा पारित उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनकी बेटी कु. प्रिया के हक में भरण-पोषण की राशि तय की गई थी। न्यायिक रिकॉर्ड के मुताबिक, फैमिली कोर्ट ने सबसे पहले वर्ष 2016 में बेटी के लिए ₹2,000 प्रति माह का भरण-पोषण भत्ता निर्धारित किया था। बाद में, बढ़ती महंगाई और जीवनयापन की जरूरतों को देखते हुए अदालत ने वर्ष 2023 में इस राशि को संशोधित कर ₹5,000 प्रति माह कर दिया था, जिससे व्यथित होकर पिता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
जिम्मेदारी से बचने के लिए पिता ने अदालत में रखीं ये दलीलें
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पिता की ओर से अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए कई तरह के तर्क और दलीलें पेश की गईं। पिता के वकील ने मुख्य रूप से यह आधार रखा कि चूंकि बेटी अब बालिग हो चुकी है, इसलिए स्थापित नियमों के तहत उसे आगे भरण-पोषण प्राप्त करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, याचिका में यह भी दावा किया गया कि बच्ची की मां के पास अपनी पर्याप्त कृषि भूमि मौजूद है और उनके पास आय के अन्य अच्छे साधन उपलब्ध हैं, जिससे वे आसानी से बेटी का पालन-पोषण कर सकती हैं। याचिकाकर्ता ने एक बेहद विवादित तर्क यह भी दिया कि यह बेटी उनकी वैध पत्नी की संतान नहीं है और उनके परिवार में लंबे समय से आपसी मतभेद और गंभीर पारिवारिक विवाद की स्थिति बनी हुई है।
हाईकोर्ट ने पिता के सभी तकनीकी तर्कों को माना नाकाफी
माननीय उच्च न्यायालय ने गहराई से विचार करने के बाद याचिकाकर्ता पिता के इन सभी तर्कों और दावों को पूरी तरह अपर्याप्त और न्यायसंगत नहीं माना। मामले की विस्तृत सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूर्व के न्यायिक रिकॉर्ड का बारीकी से अवलोकन किया और पाया कि साल 2016 से ही भरण-पोषण का मूल आदेश लगातार प्रभावी रूप से लागू है। सबसे बड़ी बात यह रही कि पिता ने उस समय या उसके बाद कई वर्षों तक इस आदेश को कभी किसी फोरम पर चुनौती नहीं दी थी। माननीय जस्टिस ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि इतने सालों तक नियमित रूप से आदेश का पालन करने के बाद, अचानक बेटी के बालिग होते ही उसके साथ संबंधों, उसकी वैधता या अपनी जिम्मेदारी को लेकर इस तरह के सवाल उठाना किसी भी दृष्टिकोण से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।

संतान का हित सर्वोपरि, तकनीकी आधारों पर नहीं मिलेगी छूट
बिलासपुर हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में साफ कहा कि बच्चों का बेहतर पालन-पोषण करना और उन्हें समाज में सम्मानजनक जीवन देना एक पिता की प्राथमिक नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी होती है। यदि देश की किसी भी सक्षम अदालत द्वारा पहले से भरण-पोषण का कोई आदेश पारित किया जा चुका है, तो केवल बेटी के 18 वर्ष की आयु पूरी कर लेने के तकनीकी आधार पर पिता उस वैधानिक जिम्मेदारी से मुकर नहीं सकता। अदालत ने स्पष्ट माना कि ऐसे पारिवारिक मामलों में तकनीकी दांव-पेंच के स्थान पर बच्चों के सर्वोत्तम हित, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और दैनिक जीवनयापन की अनिवार्य जरूरतों को हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
महिला अधिकारों के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगा यह निर्णय
कानूनी गलियारों और सामाजिक क्षेत्रों में इस फैसले को महिला अधिकारों और पारिवारिक कानून के संदर्भ में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च न्यायालय का यह निर्णय उन सभी मामलों के लिए एक अचूक मिसाल (नजीर) बनेगा, जहां अक्सर पिता अपनी बेटियों को भरण-पोषण देने से बचने के लिए केवल उनकी उम्र या बालिग होने का सहारा लेते हैं। हाईकोर्ट ने इस फैसले के जरिए समाज और कानून से बचने वाले लोगों को एक बहुत ही कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायालय द्वारा तय की गई सामाजिक और मानवीय जिम्मेदारियों से बचने के लिए कोई भी तकनीकी या मनगढ़ंत तर्क कभी पर्याप्त नहीं होंगे, क्योंकि न्याय व्यवस्था में संतान का हित ही हमेशा सर्वोपरि रहेगा।
क्या कहता है देश का कानून और पिता की वैधानिक बाध्यता
भारतीय कानूनी व्यवस्था के तहत, हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के सुस्पष्ट प्रावधानों के अंतर्गत एक पिता कानूनी और नैतिक रूप से अपनी नाबालिग और अविवाहित बेटी को उचित भरण-पोषण देने के लिए पूरी तरह बाध्य है। कानून के दायरे में आने वाले इस भरण-पोषण में केवल नकद राशि ही नहीं, बल्कि बेटी के लिए पौष्टिक भोजन, सुरक्षित आश्रय (रहने का स्थान), उच्च शिक्षा और संपूर्ण चिकित्सा देखभाल का खर्च भी अनिवार्य रूप से शामिल होता है। भारतीय न्यायशास्त्र के अनुसार, पिता की यह अटूट जिम्मेदारी बेटी के बालिग हो जाने के बाद भी तब तक निरंतर बनी रहती है, जब तक कि उसका विधि-विधान से विवाह (शादी) संपन्न न हो जाए और वह अपने पैरों पर खड़ी न हो जाए।
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