US Iran Peace Talks : वैश्विक राजनीति के मंच पर इन दिनों अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक संपर्क बढ़ने और टकराव की जगह बातचीत का रास्ता चुने जाने की उम्मीदें जताई जा रही हैं। दोनों ओर से आ रहे बयानों से ऐसा लगता है कि हालात सुधर रहे हैं, लेकिन जब हम जमीनी हकीकत पर नजर डालते हैं, तो तस्वीर इसके बिल्कुल उलट दिखाई देती है। सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास लगातार वॉर्निंग शॉट्स (चेतावनी के लिए की गई गोलीबारी) की खबरें आ रही हैं।

इसके साथ ही ईरान की ओर से की जा रही ड्रोन गतिविधियां और फारस की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना की भारी मौजूदगी तनाव को कम नहीं होने दे रही हैं। केश्म-सिरिक तट के आसपास की हालिया सैन्य घटनाएं स्पष्ट संकेत देती हैं कि यह क्षेत्र अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है; यानी बातचीत की मेज जरूर सजी है, लेकिन दोनों पक्षों की सैन्य तैयारियां भी पूरी मुस्तैदी से जारी हैं।

अविश्वास की गहरी खाई और बेंजामिन नेतन्याहू के लिए राजनीतिक संकट
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि यदि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर भरोसा होता, तो सीमा पर इतनी ज्यादा सैन्य सतर्कता दिखाई नहीं देती। किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते की असली परीक्षा कागजी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करना नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के बीच का आपसी विश्वास होता है। फिलहाल के हालात यही बयां कर रहे हैं कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच अविश्वास की खाई अभी भी पूरी तरह भरी नहीं है। अगर इस अविश्वास के बीच अमेरिका और ईरान के बीच कोई अंतिम डील (समझौता) हो जाती है, तो यह इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए बहुत बड़ी राजनीतिक मुश्किलों की शुरुआत साबित हो सकती है।
नेतन्याहू की साख पर सवाल और इजराइल की जनता का बढ़ता आक्रोश
यदि भविष्य में यह समझौता सफल हो जाता है, तो इजराइल के भीतर पहला सवाल यही उठेगा कि जब अंत में कूटनीति से ही रास्ता निकालना था, तो इतने बड़े और विनाशकारी युद्ध की जरूरत क्या थी? दूसरा, जिस ईरान को इजराइल की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा अस्तित्वगत खतरा बताया गया था, यदि उसकी सत्ता और व्यवस्था बिना किसी बड़े बदलाव के बरकरार रहती है, तो इजराइल की जनता अपनी सरकार से पूछेगी कि इतनी भारी मानवीय और आर्थिक कीमत चुकाने के बाद देश को हासिल क्या हुआ? तीसरा, इजराइल का विपक्षी खेमा इस मुद्दे को लेकर नेतन्याहू पर चौतरफा हमले तेज कर देगा कि वे ईरान को रोकने निकले थे या उन्होंने सिर्फ एक और अंतहीन संघर्ष को जन्म दे दिया।
घरेलू मोर्चे पर टकराव और अमेरिकी प्रभाव के आगे बेबस इजराइल
इस संभावित समझौते के कारण नेतन्याहू को अपनी ही सरकार के भीतर सहयोगियों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। इजराइल के सत्तारूढ़ गठबंधन का कट्टरपंथी हिस्सा ईरान के प्रति किसी भी तरह के नरम रुख या समझौते को स्वीकार करने के मूड में बिल्कुल नहीं है। सबसे बड़ा आघात नेतन्याहू की राजनीतिक साख को लग सकता है। अगर इस पूरी कूटनीतिक डील का श्रेय वाशिंगटन (डोनाल्ड ट्रंप) ले जाता है और तेल अवीव सिर्फ एक मूकदर्शक बनकर रह जाता है, तो विरोधी यह नैरेटिव आसानी से स्थापित कर देंगे कि मुख्य फैसले अमेरिका ने लिए और नेतन्याहू को मजबूरी में उन्हें स्वीकार करना पड़ा। यही वजह है कि इस डील को नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।
यूरेनियम संवर्धन और मिसाइल कार्यक्रम पर अटकी तीनों देशों की कूटनीति
इस संभावित समझौते की राह में कई जटिल मुश्किलें हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर ठोस और दृश्यमान कदम उठाए, जबकि ईरान पहले अपने ऊपर लगे आर्थिक प्रतिबंधों और समुद्री दबाव से तत्काल राहत की मांग कर रहा है। इजराइल का तर्क है कि ईरान को मिलने वाला कोई भी आर्थिक फायदा अंततः उसकी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बनेगा। मामला मुख्य रूप से संवर्धित यूरेनियम के भंडार पर नियंत्रण, मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम पर अटका हुआ है। अमेरिका इस पर तत्काल अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और सख्त निगरानी चाहता है, जबकि तेहरान इसे अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा का आंतरिक हिस्सा मानता है। इजराइल इन क्षमताओं को पूरी तरह नष्ट देखना चाहता है; यानी तीनों पक्ष बातचीत की मेज पर तो आ गए हैं, लेकिन तीनों की ‘रेड लाइन्स’ (लक्ष्मण रेखाएं) एक-दूसरे से बिल्कुल अलग और बेहद सख्त हैं।
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