Chhattisgarh Paddy Politics
Chhattisgarh Paddy Politics: छत्तीसगढ़ प्रदेश की सियासत हमेशा से ‘धान के कटोरे’ और उसे सींचने वाले किसानों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, हर कोई खुद को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की होड़ में लगा रहता है। वर्तमान में प्रदेश की राजनीति एक बार फिर धान के समर्थन मूल्य और बोनस को लेकर गरमा गई है। कांग्रेस अब धान का मूल्य ₹3286 प्रति क्विंटल करने की मांग पर अड़ गई है, जिससे राज्य सरकार पर भारी दबाव बन रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल आर्थिक मांग नहीं है, बल्कि आगामी चुनावों को देखते हुए एक सोची-झीली राजनीतिक बिसात भी है।
28 फरवरी को छत्तीसगढ़ की विष्णु देव साय सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए राज्य के लगभग 25 लाख 28 हजार किसानों के खातों में ₹10,324 करोड़ की भारी-भरकम राशि ट्रांसफर की। यह राशि केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और राज्य सरकार के वादे (₹3100 प्रति क्विंटल) के बीच का अंतर है। भाजपा और सत्ता पक्ष इसे होली से पहले किसानों के लिए एक बड़ी ‘सौगात’ और मोदी की गारंटी को पूरा करने वाला कदम बता रहे हैं। सरकार का दावा है कि उन्होंने रिकॉर्ड समय में किसानों को उनका हक दिया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई जान आएगी।
दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार के इन दावों को भ्रामक बताया है। कांग्रेस का आरोप है कि प्रदेश के किसानों को अभी भी ₹2600 करोड़ का भुगतान नहीं किया गया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और अन्य नेताओं का कहना है कि साल 2023 में भाजपा की सरकार बनने के बाद केंद्र सरकार ने दो बार MSP में वृद्धि की है, जो कुल मिलाकर ₹186 प्रति क्विंटल होती है। कांग्रेस की मांग है कि राज्य सरकार को ₹3100 के वादे के ऊपर यह अतिरिक्त ₹186 भी जोड़कर देने चाहिए, जिससे धान का कुल मूल्य ₹3286 हो जाता है। कांग्रेस का तर्क है कि यह राशि किसानों का संवैधानिक हक है और इसे रोकना अन्याय है।
कांग्रेस के इन आरोपों पर भाजपा ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। भाजपा नेता गौरीशंकर श्रीवास ने कांग्रेस के पुराने कार्यकाल की याद दिलाते हुए कहा कि जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार थी, तब भी केंद्र ने MSP बढ़ाई थी, लेकिन उस समय कांग्रेसी नेता चुप रहे थे। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस अब ‘दोहरापन’ अपना रही है और केवल राजनीति चमकाने के लिए किसानों को गुमराह कर रही है। सत्ता पक्ष के अनुसार, ₹3100 की दर तय करना ही अपने आप में एक ऐतिहासिक फैसला है, जो देश के किसी भी अन्य राज्य की तुलना में सबसे अधिक है।
भले ही कांग्रेस और किसान संगठनों की मांगें सैद्धांतिक रूप से किसानों के पक्ष में दिखती हों, लेकिन उन्हें पूरा करना सरकार की वित्तीय स्थिति के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के लिए, जो पहले से ही बड़े ऋण और जनकल्याणकारी योजनाओं के बोझ तले दबा है, अतिरिक्त ₹186 प्रति क्विंटल का भुगतान करना आर्थिक सेहत को और बिगाड़ सकता है। यही मुख्य कारण है कि भाजपा इस मुद्दे पर बचाव की मुद्रा में है और पुराने आंकड़ों का हवाला देकर कांग्रेस को घेर रही है। अब देखना यह होगा कि क्या यह ‘धान की राजनीति’ आने वाले दिनों में और उग्र रूप लेती है या सरकार कोई मध्यम मार्ग निकालेगी।
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