दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन को लेकर नए आर्थिक आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है। दूसरी तिमाही में विकास दर पिछले साढ़े तीन वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। क्या चीन मंदी की ओर बढ़ रहा है या यह अस्थायी सुस्ती है? जानिए पूरी रिपोर्ट।
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन को लेकर नए आर्थिक आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है। दूसरी तिमाही में विकास दर पिछले साढ़े तीन वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। क्या चीन मंदी की ओर बढ़ रहा है या यह अस्थायी सुस्ती है? जानिए पूरी रिपोर्ट।

China Economy : दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन इस समय एक कठिन दौर से गुजर रही है। बुधवार को जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही में चीन की जीडीपी वृद्धि दर गिरकर मात्र 4.3 प्रतिशत पर आ गई है। यह आंकड़ा पिछले तीन वर्षों में सबसे धीमी विकास दर को दर्शाता है। पिछले जनवरी-मार्च तिमाही में चीन ने 5 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की थी, लेकिन अब उसमें आई यह कमी वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बनी हुई है। हालांकि चीन ने इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्यात और एआई (AI) तकनीक के दम पर अपने निर्यात में जबरदस्त उछाल देखा है, लेकिन घरेलू मोर्चे पर अर्थव्यवस्था को मिल रही चुनौतियां कहीं अधिक गंभीर नजर आ रही हैं।


चीन की अर्थव्यवस्था पर केवल आंतरिक नहीं, बल्कि बाहरी दबाव भी साफ दिख रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है, जिसके परिणामस्वरूप दुनिया भर में मुद्रास्फीति (महंगाई) का दबाव बढ़ा है। इसका सीधा असर चीन के व्यापार और घरेलू खर्च पर पड़ा है। आईएनजी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री लिन सॉन्ग के अनुसार, 2022 की चौथी तिमाही में कोविड-19 लॉकडाउन के बाद यह सबसे धीमी तिमाही वृद्धि है। निर्यात-उन्मुख मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को जो रफ्तार मिल रही थी, वह घरेलू मांग और निवेश में आई भारी सुस्ती के कारण बेअसर हो गई है।

विशेषज्ञ चीन की इस आर्थिक मंदी के पीछे तीन प्रमुख कारकों को जिम्मेदार मान रहे हैं:
रियल एस्टेट का गहरा संकट: चीन का प्रॉपर्टी सेक्टर सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। रियल एस्टेट निवेश में 18.0% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। घरों की घटती कीमतों ने मध्यम वर्ग की संपत्ति को कम कर दिया है, जिससे लोगों का भरोसा और खर्च करने की क्षमता दोनों प्रभावित हुए हैं।
घरेलू मांग में कमी: जून में खुदरा बिक्री (रिटेल सेल्स) में मात्र 1.0% की मामूली वृद्धि हुई है, जो यह स्पष्ट करती है कि चीनी उपभोक्ता खर्च करने में संकोच कर रहे हैं। विशेषकर ऑटोमोबाइल्स और घरेलू उपकरणों की बिक्री में क्रमशः 16.1% और 8.7% की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
निवेश में भारी कमी: फिक्स्ड एसेट इन्वेस्टमेंट गिरकर -5.7% पर आ गया है, जो मई 2020 के बाद का सबसे निचला स्तर है। निवेशक भविष्य को लेकर अनिश्चित हैं, जिसके चलते नई पूंजी का प्रवाह रुक गया है।
वर्तमान में चीन की अर्थव्यवस्था केवल निर्यात के दम पर टिकी हुई है। सीमा शुल्क आंकड़ों के अनुसार, वर्ष की पहली छमाही में चीन का निर्यात 17.6 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि जून में यह 27 प्रतिशत तक पहुंच गया। चीनी सरकार ने 2026 के लिए आर्थिक वृद्धि दर का लक्ष्य 4.5 से 5 प्रतिशत के बीच तय किया है। वहीं, चीन की इन आर्थिक चुनौतियों का लाभ भारत को मिल सकता है। वैश्विक निवेशक ‘चाइना प्लस वन’ नीति के तहत भारत को एक सुरक्षित और बेहतर मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में देख रहे हैं। चीन से पूंजी और निवेश का भारत की ओर रुख करना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है।
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