China One Child Policy : चीन ने क्यों लाखों बच्चों को परिवारों से अलग किया, वन चाइना पॉलिसी का सच

China One Child Policy : चीन का तिब्बत के प्रति आक्रामक और दमनकारी रवैया अब एक ऐसे मोड़ पर पहुँच गया है, जहाँ वह हथियारों से ज्यादा बच्चों के ‘मन’ पर नियंत्रण करने की नीति अपना रहा है। दशकों से तिब्बत पर अवैध कब्जा जमाए बैठा चीन अब वहां की आने वाली पीढ़ी को उसकी मूल संस्कृति, भाषा और धर्म से पूरी तरह काटने में जुटा है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल शिक्षा व्यवस्था में बदलाव नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘सांस्कृतिक नरसंहार’ है, जिसका उद्देश्य तिब्बती पहचान को हमेशा के लिए समाप्त करना है। चीन का यह ‘सॉफ्ट पावर’ प्रोजेक्ट भविष्य की तिब्बती पीढ़ी को उनकी जड़ों से काटकर उन्हें पूरी तरह से ‘चीनी’ बनाने का एक भू-राजनीतिक षड्यंत्र है।

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बोर्डिंग स्कूलों की आड़ में बच्चों का जबरन अलगाव

भू-राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी ने ‘द हिल’ में अपने लेख के माध्यम से चीन की इस क्रूर नीति का पर्दाफाश किया है। रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने लगभग दस लाख तिब्बती बच्चों को उनके परिवारों से जबरन अलग कर दिया है। ये बच्चे अब राज्य द्वारा संचालित विशाल बोर्डिंग स्कूलों में रह रहे हैं, जहाँ उन्हें केवल मंदारिन भाषा और चीनी संस्कृति की शिक्षा दी जाती है। इन बच्चों की आयु महज 4 से 5 वर्ष है और उन्हें साल में केवल एक बार अपने घर जाने की अनुमति मिलती है। चेलानी का कहना है कि विकास के नाम पर स्थापित किए गए ये स्कूल वास्तव में ‘वैचारिक रूपांतरण केंद्र’ हैं, जहाँ बच्चों के कोमल मन से उनकी मातृभाषा और परंपराओं की स्मृतियों को मिटाने का प्रयास किया जा रहा है।

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मठों से लेकर मंदारिन स्कूलों तक का दमन

तिब्बती समाज में सदियों से मठ (Monasteries) शिक्षण और आध्यात्मिक ज्ञान का केंद्र रहे हैं। चीन ने अपनी ‘वन चाइना पॉलिसी’ को प्रभावी बनाने के लिए इन प्राचीन शिक्षण केंद्रों को हाशिए पर धकेल दिया है। तिब्बत के भीतर अब चीनी शिक्षा पद्धति और मंदारिन भाषा के स्कूलों का जाल बिछाया गया है, जिससे नई पीढ़ी का अपनी परंपराओं से संबंध टूट जाए। 1950 के दशक में तिब्बत पर कब्जे के बाद से ही वहां के मूल निवासियों को अपनी ही जमीन पर पराया महसूस कराया जा रहा है। यही कारण है कि आज करीब एक लाख से अधिक तिब्बती अपनी मातृभूमि से दूर भारत के धर्मशाला, दिल्ली और अन्य हिस्सों में निर्वासित जीवन जीने को मजबूर हैं।

भविष्य को नियंत्रित करने का भू-राजनीतिक एजेंडा

चीन की यह नीति इस सिद्धांत पर आधारित है कि “यदि आप आने वाली पीढ़ी के मन को नियंत्रित कर लेते हैं, तो आप भविष्य को नियंत्रित कर लेंगे।” तिब्बत में मंदारिन भाषा थोपना और तिब्बती भाषा को प्रतिबंधित करना मात्र एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है। चीन का यह कदम तिब्बत की सांस्कृतिक अस्मिता को पूरी तरह से निगलने की कोशिश है, ताकि आने वाले समय में तिब्बत का स्वतंत्र अस्तित्व केवल इतिहास के पन्नों तक ही सीमित रह जाए। यह वैश्विक स्तर पर चीन की विस्तारवादी सोच और उसके द्वारा चलाई जा रही दमनकारी नीतियों का एक और खतरनाक अध्याय है, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।

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