China Xinjiang Earthquake : चीन के शिनजियांग क्षेत्र में गुरुवार देर रात भूकंप के झटकों से धरती हिल उठी। रिक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 5.0 मापी गई। इस भूकंप का केंद्र चीन और लद्दाख की सीमा के नजदीक बताया गया है। भूकंप आने के बाद आसपास के क्षेत्रों में हलचल मच गई। इसकी खास बात यह रही कि झटके केवल चीन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि भारत के जम्मू-कश्मीर के कई इलाकों में भी महसूस किए गए। देर रात तक इस प्राकृतिक घटना से किसी बड़े नुकसान या जनहानि की सूचना सामने नहीं आई थी।
चीन-लद्दाख सीमा के पास था भूकंप का केंद्र
कश्मीर वेदर की ओर से साझा की गई जानकारी के मुताबिक, भूकंप का केंद्र 35.587 डिग्री उत्तरी अक्षांश और 78.130 डिग्री पूर्वी देशांतर पर स्थित था। इसकी गहराई जमीन से लगभग 164 किलोमीटर नीचे दर्ज की गई। भूकंप का केंद्र सीमा के नजदीक होने के कारण जम्मू-कश्मीर के कुछ इलाकों में भी इसके झटके महसूस किए गए। हालांकि, शुरुआती जानकारी के अनुसार किसी तरह की बड़ी तबाही, इमारतों के क्षतिग्रस्त होने या लोगों के हताहत होने की खबर नहीं मिली। प्रशासन और संबंधित एजेंसियों की ओर से स्थिति पर नजर रखी जा रही है।

फरीदाबाद और लक्षद्वीप सागर में भी दर्ज किए गए भूकंप
गुरुवार को भारत के अलग-अलग हिस्सों में भी भूकंपीय गतिविधियां दर्ज की गईं। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) के आंकड़ों के मुताबिक, शाम 7 बजकर 54 मिनट पर लक्षद्वीप सागर में 3.2 तीव्रता का भूकंप आया। इससे पहले शाम 6 बजकर 33 मिनट पर दिल्ली से सटे हरियाणा के फरीदाबाद में भी धरती हिली थी। यहां भूकंप की तीव्रता 2.9 मापी गई। विशेषज्ञों के अनुसार, कम तीव्रता वाले भूकंप अक्सर सामान्य परिस्थितियों में महसूस नहीं होते। हालांकि, इन घटनाओं की निगरानी करना जरूरी होता है, ताकि क्षेत्र में होने वाली भूकंपीय गतिविधियों का सही आकलन किया जा सके।

तिब्बती पठार और हिमालयी क्षेत्र में बढ़ रही भूकंपीय हलचल
पिछले कुछ महीनों से तिब्बती पठार और इसके आसपास स्थित हिमालयी क्षेत्रों में भूकंपीय गतिविधियों को लेकर चिंता बनी हुई है। इससे पहले 22 अक्टूबर को तिब्बत में 7.0 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आने की जानकारी सामने आई थी। भारत के राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के मुताबिक, उस भूकंप का केंद्र ल्हासा से लगभग 400 किलोमीटर दूर था। इसकी गहराई करीब 173 किलोमीटर दर्ज की गई थी। लगातार अलग-अलग क्षेत्रों में भूकंप की घटनाएं सामने आने से हिमालयी क्षेत्र की भूगर्भीय स्थिति पर विशेषज्ञों का ध्यान बढ़ा है।
हिमालयी क्षेत्र पहले भी झेल चुका है प्राकृतिक आपदाओं की मार
हिमालय और तिब्बती पठार के आसपास के इलाके पहले भी कई विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर चुके हैं। अगस्त में नेपाल और तिब्बत सीमा के पास बर्फ तथा चट्टानों के हिमस्खलन से जुड़ी फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचाई थी। दी गई रिपोर्ट के अनुसार, इस आपदा में नेपाल में 1,455 लोगों की मौत हुई थी, जबकि हजारों लोग लापता बताए गए थे। तिब्बत की ओर भी कई लोगों की मौत और सैकड़ों लोगों के लापता होने की खबरें सामने आई थीं। इस घटना ने पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ रहा प्राकृतिक आपदाओं का खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण किंगहाई-तिब्बत पठार और आसपास के हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम बढ़ सकता है। लगातार बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और चरम मौसमी घटनाएं इस क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बन रही हैं। ग्लेशियर पिघलने से झीलों में पानी का स्तर बढ़ने और अचानक बाढ़ आने का खतरा पैदा हो सकता है। हालांकि, भूकंप और ग्लोबल वार्मिंग के बीच सीधा संबंध मानना सही नहीं होगा। भूकंप मुख्य रूप से भूगर्भीय प्लेटों की गतिविधियों से पैदा होते हैं। ऐसे में हिमालयी क्षेत्रों में भूकंप, भूस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाओं की निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

