CJI Gavai oral mention ban: CJI गवई का बड़ा फैसला,11 अगस्त से अर्जेंट सुनवाई की मौखिक मांग पर रोक

CJI Gavai oral mention ban: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक अहम घोषणा की। उन्होंने कहा कि 11 अगस्त से उनकी अदालत में सीनियर वकील अब अर्जेंट सुनवाई के लिए मौखिक आग्रह नहीं कर पाएंगे। हालांकि, जूनियर वकीलों को इस नियम से छूट दी गई है। गवई ने स्पष्ट कहा, “कम से कम मेरी अदालत में इस नियम का सख्ती से पालन किया जाएगा।”

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अन्य जजों से भी व्यवस्था अपनाने की अपील

CJI गवई ने सुझाव दिया कि सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों को भी यह व्यवस्था अपनानी चाहिए ताकि कोर्ट की कार्यवाही सुचारू रूप से चल सके और सूचीबद्ध मामलों में व्यवधान न हो। आमतौर पर कार्यवाही की शुरुआत में वकील अर्जेंसी का हवाला देकर तत्काल सुनवाई की मांग करते हैं, जिससे पहले से तय मामलों की सुनवाई प्रभावित होती है।

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पहले खत्म की गई थी यह परंपरा

मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद गवई ने 14 मई को वकीलों को अर्जेंसी की मौखिक जानकारी देने की अनुमति दी थी। इससे पहले कार्यवाहक CJI रहे जस्टिस संजीव खन्ना ने इस परंपरा को समाप्त कर दिया था और वकीलों को ईमेल या लिखित अर्जी के माध्यम से अर्जेंसी बताने का निर्देश दिया था। लेकिन गवई ने इसे फिर से लागू कर दिया था, जो अब सीमित रूप में केवल जूनियर वकीलों के लिए जारी रहेगी।

CJI गवई का कानूनी सफर: ज़मीन से सुप्रीम कोर्ट तक

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई का जन्म 24 नवंबर 1960 को महाराष्ट्र के अमरावती में हुआ था। उन्होंने 1985 में कानूनी पेशे में कदम रखा और 1987 में बॉम्बे हाईकोर्ट में स्वतंत्र प्रैक्टिस शुरू की। अपने शुरुआती करियर में उन्होंने पूर्व एडवोकेट जनरल और हाईकोर्ट जज स्व. राजा एस. भोंसले के साथ कार्य किया।

सरकारी वकील से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का सफर

1987 से 1990 तक बॉम्बे हाईकोर्ट में वकालत करने के बाद, अगस्त 1992 से जुलाई 1993 तक वे नागपुर बेंच में सहायक सरकारी वकील और अतिरिक्त लोक अभियोजक रहे। 14 नवंबर 2003 को उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया और 12 नवंबर 2005 को उन्हें स्थायी न्यायाधीश बना दिया गया। CJI गवई का यह निर्णय न्याय प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। यह नियम कोर्ट के कार्यदिवस की उत्पादकता को बढ़ाएगा और सूचीबद्ध मामलों की अनावश्यक देरी से बचाएगा। इससे विशेष रूप से जूनियर वकीलों को अवसर मिलेगा, जो न्यायिक प्रणाली में अपनी जगह बना रहे हैं।

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