Conflict in Surguja Health Department : सरगुजा जिले के स्वास्थ्य विभाग में इन दिनों प्रशासनिक आदेश और न्यायालयीन निर्देशों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। जिला मलेरिया अधिकारी के प्रभार को लेकर जारी विवाद अब कारण बताओ नोटिस, आदेश निरस्तीकरण और हाईकोर्ट के स्थगन आदेश तक पहुंच गया है, जिससे पूरे विभाग में असमंजस की स्थिति निर्मित हो गई है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय द्वारा जारी नोटिस के अनुसार, मेडिकल लैब तकनीशियन राजेश कुमार गुप्ता को 22 अप्रैल 2026 के आदेश के तहत जिला मलेरिया अधिकारी के प्रभार से हटा दिया गया था और उनकी जगह डॉ. दीपक गुप्ता (पीजीएमओ पैथोलॉजी) को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। आरोप है कि इसके बावजूद राजेश गुप्ता ने न केवल जिला मलेरिया अधिकारी कक्ष पर कब्जा बनाए रखा, बल्कि विभागीय सील और पद का उपयोग करते हुए पत्राचार भी जारी रखा।
CMHO ने इसे शासकीय पद और सील का दुरुपयोग मानते हुए कड़ा रुख अपनाया है। नोटिस में उन्हें तत्काल कक्ष की चाबियां और समस्त प्रभार सौंपने के निर्देश दिए गए हैं, साथ ही एक दिन के भीतर स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने को कहा गया है। स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर निलंबन और FIR दर्ज की जा सकती है।
इसी बीच, विभाग ने 22 अप्रैल 2026 के बाद राजेश गुप्ता द्वारा जारी सभी पत्रों और निर्देशों को शून्य घोषित कर दिया है। यह आदेश जिले के सभी खंड चिकित्सा अधिकारियों, स्वास्थ्य केंद्रों और मलेरिया स्टाफ को भेजा गया है, जिससे उनके द्वारा किए गए किसी भी प्रशासनिक कार्य को अमान्य करार दिया गया है।
हालांकि, इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आया जब राजेश कुमार गुप्ता ने माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर में याचिका दायर कर दी। उन्होंने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि CMHO के 16 अप्रैल 2026 के आदेश के खिलाफ उन्होंने याचिका (WPS/3749/2026) दायर की थी, जिस पर 30 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट ने स्थगन आदेश पारित किया है। गुप्ता का दावा है कि इस आदेश के बाद वे जिला मलेरिया अधिकारी एवं संभागीय नोडल अधिकारी के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं।
अब सवाल यह खड़ा हो गया है कि एक ओर विभागीय आदेश के तहत उन्हें पद से हटाया जा चुका है, जबकि दूसरी ओर हाईकोर्ट के स्थगन आदेश का हवाला देकर वे अपने अधिकार जारी रखने की बात कर रहे हैं। ऐसे में प्रशासनिक और कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं होने से विभागीय कामकाज प्रभावित होने की आशंका है।
इस पूरे घटनाक्रम ने स्वास्थ्य विभाग में अनुशासन, अधिकार और न्यायालयीन हस्तक्षेप को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि विभाग और न्यायालय के बीच इस टकराव का अंतिम समाधान क्या निकलता है।
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