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अचानक बदली गाइडलाइन से मतदाता सूची पर संकट, सरगुजा में 2 लाख से अधिक मतदाता जांच के दायरे में

Ambikapur News : दावा–आपत्ति की प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में पहुंचते ही चुनाव आयोग द्वारा जारी की गई नई गाइडलाइन ने मतदाता सूची को लेकर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। आयोग के ताज़ा निर्देशों के तहत अब तक सुरक्षित माने जा रहे ए और बी श्रेणी के मतदाताओं को भी जांच के दायरे में ला दिया गया है। अचानक लागू हुए इन नियमों के कारण सरगुजा जिले में ही दो लाख से अधिक मतदाता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है, जबकि अकेले अंबिकापुर विधानसभा क्षेत्र में ऐसे मतदाताओं की संख्या 70 हजार से ज्यादा बताई गई है।

नई गाइडलाइन के अनुसार चुनाव आयोग ने ए और बी श्रेणी के मतदाताओं को पांच बिंदुओं पर चिन्हित कर जांच में शामिल किया है। इनमें 2003 की मतदाता सूची से नाम के अक्षरों का मेल न होना, एक ही पिता के नाम से छह से अधिक प्रविष्टियां, पिता–पुत्र/पुत्री की आयु में 15 वर्ष से कम या 50 वर्ष से अधिक का अंतर, तथा दादा–पोता/पोती की आयु में 40 वर्ष से कम का अंतर शामिल है।

सबसे अहम बात यह है कि एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) की प्रारंभिक गाइडलाइन और पूर्व बैठकों में इन बिंदुओं का कहीं उल्लेख नहीं था। यहां तक कि बिहार में हुए एसआईआर में भी इस तरह की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी। पहले स्पष्ट रूप से कहा गया था कि ए और बी श्रेणी के मतदाताओं के नाम सुरक्षित रहेंगे, लेकिन आयोग के इस नए फरमान ने स्थिति पूरी तरह बदल दी है।

राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह सवाल भी उठ रहा है कि 2003 की सूची में नाम या आयु संबंधी त्रुटियां अगर हैं, तो वह निर्वाचन विभाग की गलती है, जिसका खामियाजा आम मतदाता क्यों भुगते। आयु के अनुपात को लेकर बनाई गई गाइडलाइन का भी कोई ठोस आधार स्पष्ट नहीं किया गया है। कई मामलों में प्रविष्टि की गलती विभागीय स्तर पर हुई है, फिर भी अब लगभग 35 प्रतिशत मतदाताओं को संदेह के कटघरे में खड़ा कर दिया गया है।

अनुविभागीय अधिकारी अंबिकापुर ने बैठक में जानकारी दी कि ऐसे मतदाताओं की बूथवार सूची अभी उपलब्ध नहीं है और न ही उन्हें कोई नोटिस जारी किया जाएगा। बीएलओ को निर्देश दिए गए हैं कि वे डोर-टू-डोर जाकर बीएलओ एप के माध्यम से आधार कार्ड सहित अन्य आवश्यक दस्तावेज अपलोड कराएंगे। दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल होगा।

हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में तीन बड़ी व्यावहारिक समस्याएं सामने आ रही हैं। पहली, गणना प्रपत्र वितरण में पहले ही बीएलओ की शिथिलता रही है, ऐसे में डोर-टू-डोर अभियान पर सवाल उठ रहे हैं। दूसरी, बीएलओ एप पूरी तरह अंग्रेजी में है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाता ही नहीं, कई बीएलओ भी असहज हैं। विकल्प के गलत चयन से सही मतदाता का नाम भी कट सकता है। तीसरी और सबसे गंभीर समस्या समय की है—13 जनवरी को जारी गाइडलाइन को पूरा करने के लिए मात्र 19 जनवरी तक यानी सिर्फ छह दिन का वक्त दिया गया है।

प्रशासनिक अधिकारियों का भी मानना है कि पूरी क्षमता से काम होने के बावजूद 10 से 15 प्रतिशत मतदाताओं के नाम विलोपित होने की आशंका बनी हुई है। ऐसे में यह डर भी गहराता जा रहा है कि कहीं इस प्रक्रिया के जरिए किसी विशेष वर्ग या पार्टी के मतदाताओं को प्रभावित कर मतदाता सूची को एकतरफा बनाने की कोशिश तो नहीं हो रही।

स्थिति को देखते हुए राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों और विशेष रूप से बीएलए से अपील की है कि वे तत्काल अपने-अपने क्षेत्रों के बीएलओ से संपर्क कर इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएं। क्योंकि अब यह मानकर चलना होगा कि हर दूसरा या तीसरा मतदाता इस जांच के दायरे में आ सकता है और समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो नाम मतदाता सूची से बाहर होना तय है।

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